विज्ञापन वाली लड़की

बीते एक हफ्ते से लगातार पानी बरस रहा था। आसमान में सुरमई बादल भाप की तरह उड़ते थे और आभासी उजाले में भागती गाडिय़ों की हेडलाइट में आसमान से गिरती बूंदें चमकने लगती थीं। इस मौसम में उसे करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर शाम को दफ्तर पहुंचना होता था। गोल घेरा बनाकर बैठे मजदूरों, चाय की प्याली से उठती भाप, टीन के ढाल पर बहते पानी के रेले और सजी मंडी की कीच भरी गलियों को पार करता वह कुछ ही देर में हाइवे पर निकल जाता था। इस हाइवे पर आकर वह करीब एक किलोमीटर की बचत कर लेता था। यहां आसपास नयी जिंदगी बस रही थी। हजारों मजदूर ईंट ढोते और गारा तैयार करते नजर आते। शहर बदल रहा था। इस शहर की हलचल दरअसल उस वीराट धक-धक का एक हिस्सा थी, जो वहां सिर्फ दो सौ किलोमीटर पर हो रही थी। यह दुनिया के एक बहुत बड़े महानगर के सीमांत पर बसा कसबेनुमा शहर था, जिसकी तलछटों में कालिख, धुएं और शोर में डूबे इलाके थे।

यह शहर उसके अपने घर उसकी बीमार मां से एक हजार किलोमीटर दूर था। जिस अखबार के दफ्तर में वह काम करता था, वह शहर के बाहरी हिस्से में बसे इंडस्ट्रीयल एरिया में बना था। कागज के भारी-भरकम रोल के बीच से गुजरता हुआ वह गोदाम जैसे बड़े हाल की सीढिय़ां चढ़ता था, जिसके कोने पान की पीक से कत्थई रहते थे। ऊपर लाइन से कंप्यूटर लगे थे, इनके की-बोर्ड और स्क्रीन मटमैले हो चुके थे और पीछे लगे तार महीनों पुरानी धूल से अटे रहते थे। वह सीट पर जाते ही खाकी लिफाफों को फाड़ता, तह लगाये कागजों को स्टैंड पर लगाता और काली-नीली रोशनाई पर आंखें टिका देता। ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में दर्जन भर की-बोर्ड खडख़ड़ाते रहते। आधी रात बीत जाने के बाद काम खत्म होता था। अक्सर पैदल ही दूसरे रास्ते से घर की तरफ चल देता था।

एक शाम जब आसमान में बादल बहुत निचाई पर धुएं की तरह तैर रहे थे और हवाओं का मिजाज तूफानी था, उसने पेड़ के नीचे ठिठुरते हुए वह विशालकाय होर्डिंग देखा। वह अवाक रह गया। उधर से दौड़ती गाडिय़ों की हेडलाइट होर्डिंग पर रोशनी के सैकड़ों प्रतिबिंब बना रहे थे। वह एक मोबाइल कंपनी का बेहद लंबा होर्डिंग था। उसका अधिकांश हिस्सा खाली था। बायीं तरफ एक लड़की खास भंगिमा में खड़ी मुस्कुराती हुई खड़ी थी। वह हैरान रह गया। वह दरअसल मुस्कुराती हुई उसी की तरफ देख रही थी।

उस दिन उसे हल्का सा बुखार भी था। संदेह को झुठलाने के लिए उसने सावधानी से सड़क पार की। लड़की अभी भी अपलक देख रही थी। अब देखने में ज्यादा बेबाकी थी। उसकी पूरी मौजूदगी में एक तपिश थी। एक मद्धिम आंच – जो उसकी आंखों के पीछे आहिस्ता-आहिस्ता सुलग रही थी। बलखाए बालों के बीच गाल दहक रहे थे। मुस्कुराहट में भी एक ताप था। ऐसी सुंदरता थी जो आग में होती है – निषिद्ध, खतरनाक और गरमाहट से भरी सुंदरता – जंगल में जलने वाली आग की तरह रहस्यमय। तो क्या बचपन से वह जो ख्वाब देख रहा था सही साबित हुआ। आखिर इस तकलीफ से भरी जिंदगी से परे कोई तो दुनिया है। जहां लोग सचमुच उसी तरह से खुश हैं, जिस तरह से उन्हें होना चाहिए।

इन ख्वाहिशों ने लंबी तपती दुपहरियों में ऊंधते कसबे के उन उकताहट से भरे दिनों जन्म लिया था, तब वह तेरह साल का था। पिता को गुजरे भी दो ही साल बीते थे। वे एक सरकारी महकमे में बाबू थे। मां उसे लेकर सालों से बंद उस पुश्तैनी मकान में लौट आयीं, जिसकी छत पर लकड़ी की दीमक खाई कड़ियां लगी थीं। वहां की नक्काशीदार पल्लों वाली एक अलमारी पुरानी पत्रिकाओं से भरी पड़ी थी। सन 1958 से लेकर 1974 तक की पत्रिकाएं – जिनके कागज पीले पड़ चुके थे और हर पत्रिका में कागज से एक अलग किस्म की खुशबू उठती थी। यह पिता से उम्र में बहुत बड़े उसके ताऊजी का संग्रह था। वह अक्सर उन पत्रिकाओं की धूल झाड़ता और उन्हें लेकर बैठ जाता था।

उसे विज्ञापन सबसे ज्यादा दिलचस्प लगते थे। जिनमें मुस्कुराते हुए स्वस्थ नन्हें बच्चे थे। थोड़े बड़े बच्चों में हमेशा एक भाई और एक बहन दिखाई देते। बहन फूलों की छाप वाला फ्राक पहने रहती और उसकी हमेशा दो चुटिया बनती थी। इन बच्चों के साथ हमेशा उनके माता-पिता होते थे। बुजुर्ग दादा या नाना हमेशा कुर्सी पर अखबार पढ़ते दिखते और खुशमिजाज बूढ़ी औरतें सिलाई करती या स्वेटर बीनती नजर आती थीं। इन पुरानी पत्रिकाओं में भी फिल्मी अभिनेत्रियां एक खास साबुन को अपनी सुंदरता का राज बताती थीं। उनकी क्लैक एंड व्हाइट तस्वीर छपी होती थी। सन बासठ के बाद की बच्चों पत्रिकाओं में चीन को ललकारने वाली बाल कविताओं के अलावा अक्सर टाफियों के विज्ञापन होते थे। टाफियों के चौकौर और गोल टीन के डिक्बों पर ब्रिटिश स्टाइल के हेयर कट और फ्राक वाली युवतियां होती थीं। वह पूरा-पूरा दिन इन विज्ञापनों में डूबा रहता था।

बचपन से ही उसे अक्सर बुखार आता था। बुखार से समय वे तसवीरें रात को सोते वक्त तक उसके हवास पर छायी रहती थीं। वह खुद को बड़ा होने पर अक्सर प्रिंटेड शर्ट और बेलबॉटम पहने मोटरसाइकिल चलाते एक युवक के रूप में देखता था, जिसे उसने शूटिंग-शर्टिंग के एक विज्ञापन में देखा था। वह मां को हमेशा घर में बने मंदिर के पास आरती की थाल लिये देखता था। वह मुस्कुराते हुए उसे आशीर्वाद देती थी – वह शायद घी के किसी विज्ञापन से निकली थी।
पड़ोस से मांगी कुछ नयी-ताजी पत्रिकाओं में कभी-कभार चिकने रंगीन पन्नों पर तौलिया लपेटे वह युवती दिखाई दे जाती – जिसकी जांघों का बड़ा हिस्सा खुला होता था या फिर गीजर के विज्ञापन में दरवाजे के पीछे से झांकती मॉडल, जिसके कंधों से लेकर कमर के नीचे तक का आधा हिस्सा बिल्कुल नग्न दिखाई देता। इन तसवीरों को वह देर तक देखता था – एक अव्यक्त सी सनसनी के साथ।

बदलते विज्ञापनों के साथ उसके सपने भी बदलते गये। अब इन विज्ञापनों में हीरो साइकिल पर सवार उमंगों से भरे युवक-युवतियों के बीच प्रेम की तितलियां नहीं फडफ़ड़ाती थीं। उनकी जगह कसरती शरीर वाले जीन्स पहने उन नौजवानों ने ले ली थी, जो रोमांचकारी यात्राओं के शौकीन थे। उनके पास बाइक और स्पोर्ट-शू थे। उनके कमरे में गिटार लटकता रहता और टेबल पर बाइनाक्यूलर, कंपास और रोड मैप फैला दिखाई देता। विज्ञापन में युवतियां अब शालीन स्वभाव और करीने से पहने कपड़ों को पसंद करने की बजाय गठीले बदन और मर्दाने अंदाज पर फिदा होती थीं। उम्र बढने के साथ-साथ उसकी काठी, चेहरा-मोहरा और समूची शख्सियत विज्ञापनों के संसार से निराशाजनक हद तक भिन्न थी।

लंबी बेरोजगारी, ट्राइका की गोलियों और मां की उदासी के बाद नौकरी करने वह अपना घर छोड़कर यहां चला आया। यह नौकरी उसके मामा ने लगवायी थी। दूधिया रोशनी में नहाये विशाल होर्डिंग तेजी से उस शहर में फैल रहे थे। टेलीविजन पर कोल्ड ड्रिंक पीते बिंदास नौजवान हों या घड़ी के विज्ञापन में टेनिस खेलते, टाई की गांठ बांधते हाथ या फिर साबुन, खुशबूदार मसाले या कंडोम के बहाने चुहल करते नवदंपति, वह सभी को पूरी दिलचस्पी से देखता था। उसे उसी दूसरी दुनिया की तलाश थी। उस संसार में एक अनुशासन था, कोई बुरा नहीं था, सभी एक-दूसरे की इज्जत करते थे, सभी खुश थे, सभी वर्तमान में जीते थे।

उस रात डेढ़ बजे ग्रिड फेल हो गयी और पूरा शहर अंधकार में डूब गया। आसमान में बिजली लगातार कंपकंपा रही थी मगर कोई गर्जना नहीं थी। हवा बिल्कुल चुप थी। वह गलियों से होता हाइवे की तरफ निकल आया। आज होर्डिंग अंधेरे में डूबा हुआ था। करीब डेढ़ मिनट पैदल चलने के बाद बाद अचानक आधा आसमान भक से सफेद हो उठा। बिजली की इस कौंध में उसने जो देखा, तो उसे खुद पर यकीन नहीं हुआ…

विज्ञापन वाली लड़की होर्डिंग में नहीं थी।

वह कहां चली गयी? वह बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचता रहा। नहीं! तस्वीरें बेजान नहीं होतीं। वह लड़की भी आजाद हो गयी है। वह तीर की तरह उस अंधेरी रात में निकल पड़ा। गलियों में भौंकते आवारा कुत्तों और डीजल सने कीचड़ में धंसे ट्रकों के बीच मंडराते हिजड़ों से बचता वह मंडी की तरफ भागा जा रहा था। वह पूरे जीवन जो सोचता रहा वह गलत नहीं था। उस ‘दूसरी दुनिया’ का अस्तित्व है। वह लड़की सचमुच है। बूंदें बे-आवाज उस अंधेरे में डूबे शहर पर गिरने लगीं। एक गली से दूसरी गली छानते हुए आखिर वह मिल गयी। बारिश में तरबतर। दुकानों के शटर के बीच खाली हिस्से में दुबकी हुई। बारिश में भीगकर उसका ताप खत्म हो चुका था। वह रात के अंधेरे में राख की तरह उदास और सुरमई लग रही थी।

अब वह तौलिये से अपने बाल सुखा रही थी। सवा महीने से होर्डिंग में अटकी लड़की आज उसके घर थी। उसने लड़की को गरम चाय पिलायी और नारियल वाले बिस्कुट खाने को दिए, जिसे उसने चुपचाप बच्चों की तरह खा लिया। सुबह होने वाली थी। वह सूखे कपड़ों और चादर की गरमाई में दुबककर सो गयी। सुबह 10-11 बजे आंख खुली तो देखा कि विज्ञापन वाली लड़की ने किसी भी आम हिंदुस्तानी स्त्री की तरह उसके कमरे में बिखरे सामान को काफी करीने से लगा दिया था। खुद चुपचाप कोने में बैठी अपने नाखूनों को कुरेद रही थी। वह उस लड़की से बात नहीं करना चाहता था। उसे भय था कि कहीं बात करते ही यह पारभासी हकीकत छिन्न-भिन्न न हो जाए। इसलिए वह जल्दी से जल्दी दिन की रोशनी में उस होर्डिंग को दोबारा देखना चाहता था। दोपहर डेढ़ बजे ही वह हाइवे पहुंच गया। होर्डिंग रात की तरह खाली था।

किशोरावस्था के दिनों में ‘कंप्लीट मैन’ की परिभाषा बताने वाली एक शूटिंग-शर्टिंग कंपनी का विज्ञापन उसे बेहद पसंद था। उनमें हंसमुख, उदार, बच्चों और जानवरों के साथ खेलने वाले, एकांतप्रिय और प्रतिभावान पुरुष होते थे। वे स्त्रियों से प्रेम करते थे मगर अपनी बनायी दुनिया से कभी बाहर नहीं निकलते थे। बाद के सालों में जवानी में कदम रखने के साथ टेलीविजन पर वाशिंग मशीन, रेफ्रीजिरेटर, कम कीमत वाली कारें और माइक्रोवेव ओवेन अपने साथ रिश्ते, प्रेम, सहनशीलता और सुखी जीवन की नयी परिभाषाएं लेकर आए।

उस दिन जब वह घर पहुंचा तो शाम हो गयी थी। मौसम खुला था। छत पर गया तो देखा कि जिस तरफ अभी-अभी सूरज डूबा था, उस तरफ दर्जनों पतंगें हवा में हलके-हलके कांप रही थीं। वह दरवाजा खोलकर अंदर गया तो देखा लड़की फर्श पर घुटने मोड़े सो रही थी। इस वक्त वह ग्लैमरस मॉडल नहीं बल्कि किसी आम सुंदर लड़की जैसी दिख रही थी। अगस्त की उमस के चलते उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आयी थीं। कमरे से लगे छोटे से चौकोर किचेन में खाली बरतनों से अंदाजा लग गया कि दुपहर में उसने अपने खाने के लिए कुछ पकाया भी था। वह खुद भी फर्श पर बैठ गया और उसे सोते हुए देखता रहा।

उसे चाकलेट कंपनी का वह विज्ञापन याद आ गया जिसने सबसे पहले उसके जेहन में साहचर्य का भाव विकसित किया था। उसे एहसास हुआ कैसे दो इंसान उम्र और रिश्तों में अलग-अलग होते हुए भी एक दूसरे के मन की बात को समझ सकते हैं। अब तो उन दोनों के बीच बातचीत भी शुरू हो गयी थी। शुरुआत उस लड़की ने ही की थी। जब पहली बार लड़की की आवाज कानों से टकराई तो एक पल के लिए उसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ। बहुत साफ आवाज और बहुत स्पष्ट से शब्द।

‘तुम मुझे पहचानती थी?’
‘हां, सचमुच, तुम सबसे पहले थे – जिसने मेरी तरफ अलग तरीके से देखा, जैसे मुझे सचमुच जानते हो…’
‘मैंने देखा कि तुम मुझे देख रही थी…’
‘हां, मैं तुमको ही देख रही थी, तुम कितनी रात गये उधर से अकेले जाते थे।’
‘मैंने आज तक यह बात किसी को नहीं बतायी है कि तुम मुझे देखती रही और अब मेरे पास हो।’
‘किसी को भी बताना भी मत…’
‘… पर तुम कौन हो?’
‘जैसे तुम हो, वैसे ही मैं भी हूं!’

लड़की ने उसे तमाम दिलचस्प बातें बतायीं। जैसे कि वह एक महत्वाकांक्षी एड डिजाइनर की कल्पना है। उसने अपने कंप्यूटर में सैकड़ों युवतियों की तस्वीर को फीड करने के बाद उसका निर्माण किया। उसे सुंदरता, मुस्कुराहट और शोखी दी। लड़की ने हंसते हुए कहा – तुम दरअसल तुम नहीं हो, तुम तो हजारों विज्ञापनों की एक संरचना हो – बिल्कुल मेरी तरह। बस फर्क इतना है कि तुम दर्पण के उस तरफ हो और मैं इस तरफ।

दोनों साथ बैठकर खाना खाते और फिर बातें करते हुए वहीं फर्श पर लेटे-लेटे सो जाते। अर्सा पहले एक कंपनी ने यह समझाया था कि घड़ियां सिर्फ समय देखने के लिए नहीं होतीं, वे अगर तोहफा बनें तो प्यार के इज़हार का तरीका भी होती हैं और शरीर का आभूषण भी। उस विज्ञापन ने समझाया समय सिर्फ वह नहीं जो घड़ी में नजर आता है, समय वह है जो जीवन में घटित होता है, घड़ी तो उसका महज गवाह होती है।

वे बातों-बातों में एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। इतना कि लड़की के शरीर से उठती खुशबू उसके नथुनों से टकराने लगती। वह लेटे-लेटे सोई हुई लड़की की सांसों के साथ उठते-गिरते सीने को देखता रहता। उस शाम लड़की का टाप पेट से बित्ते भर ऊपर खिसका हुआ था और जींस के बटन से थोड़ा ऊपर उसकी नाभि दिखाई दे रही थी। उसकी त्वचा की रंगत में एक किस्म की गहराई थी – जैसे बहुत दूध डालकर बनायी गयी चाय की रंगत। उस शरीर से गुजरते हुए एक दूसरी दुनिया के दरवाजे खुलते थे, जहां हंसते ईमानदार लोग थे। छोटी-छोटी बातों में खुशी तलाशने वाले लोग थे। उसने लड़की के पेट के निचले हिस्से पर कसी हुई जींस का बटन खोल दिया। उसी वक्त लड़की की आंखें खुल गयीं थीं। शहर पर झुके बादलों में लगातार गडग़ड़ाहट हो रही थी। तभी शायद लड़की ने जो कुछ कहा वह उसे सुनाई नहीं दिया। बादलों की गडग़ड़ाहट बहुत देर तक आसमान में भटकती रही। वह स्तब्ध सा उसके ऊपर झुका रह गया। लड़की की आंखों में रोष भरी नमी थी।

वह जाने कब सो गया। आंख खुली तो चेहरा आंसुओं से तरबतर था। वह बुखार में तप रहा था। रात के नौ बज रहे थे। कमरे में चारों तरफ लड़की कहीं नहीं दिखाई दी। उसने जल्दी-जल्दी किचेन और बाथरूम भी छान मारा। बाहर झांका तो पानी लगातार बरस रहा था – पूरे शोर के साथ।

उस रात जैसे आसमान फट पड़ा। इस पूरे मौसम में ऐसी बारिश कभी नहीं हुई। सड़क से लगे चबूतरों की सीढिय़ां पानी में पूरी डूब गयीं। कुत्ते पानी में तैरते हुए इधर से उधर भाग रहे थे। गलियों में घुटनों तक हरहराता पानी बह रहा था। उसने देखा पानी में अखबारों के टुकड़े बहे चले जा रहे थे। सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन, चाय के खाली डब्बे पर मुस्कुराती गृहणी और दीवारों से उखड़े सिनेमा के पोस्टर उस तेज धार में नाचते हुए आंखों से ओझल हो गये। वह लड़की को खोजने के लिए भटकता रहा। मंडी में बने विशालकाय गोदाम – जहां छत पर बने पाइपों से शोर करता हुआ पानी नीचे गिर रहा था, टखनों तक पानी से भरी गलियां, सड़क के किनारे खड़ी ट्रकों की अंतहीन कतार – वह कहीं नहीं मिली। उसे अपने पेट के निचले हिस्से में फिर ऐंठन सी महसूस हुई, मगर इस बार ज्यादा तकलीफदेह। उसे कंपकंपी सी लगी और नथुनों से आती-जाती सांस गरम महसूस हो रही थी। उसे फिर बुखार आ गया था। वह भागता हुआ हाइवे की तरफ जा रहा था। सड़क के बगल से नाला गुजरता था। उसमें से ऐसा शोर उठ रहा था जैसे किसी पहाड़ी नदी से उठता है।

वह लोहे के उन भारी-भरकम एंगल के पास कांपता हुआ खड़ा हो गया, जिन पर वह विशाल होर्डिंग टिका था। उसने खुद को शांत करने का प्रयास किया मगर उसके भीतर कंपकंपी बढ़ती चली गयी। उसके पेट में फिर तकलीफदेह ऐंठन शुरू हो गयी। वह पानी से इस कदर तरबतर हो गया था कि उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी। माथे से बहता पानी नाक-मुंह के भीतर घुसता चला जा रहा था। वह घुटनों के बल वहीं कीचड़ में बैठ गया।

अगली सुबह भी आसमान में बादल छाये थे और हल्की फुहार गिर रही थी। हाइवे पर एक लावारिस शव मिला। पानी से सराबोर शरीर बिल्कुल ठंडा और अकड़ा हुआ था। जेब में मिले कागजों से पता लगा कि वह उसी शहर से छपने वाले अखबार के दफ्तर में एक कंपोजीटर था। उसके कमरे की छानबीन से भी कुछ खास पता नहीं चला। किचेन देखने से लग रहा था करीब दो हफ्ते से उसमें खाना नहीं पका है। अलबत्ता उसके रूम में अखबारों और पत्रिकाओं से काटी गयी विज्ञापनों की ढेरों कटिंग बरामद हुई। उनमें से बहुत सी कमरे में बिखरी हुई थीं और कई पालीथीन में सहेज कर रखी हुई थीं। घर में बन और डबलरोटियों के खाली रैपर छिटके हुए थे। एक लेटर पैड पर चार-पांच लाइनें लिखी हुई थीं। शायद वह अपनी मां को चिट्ठी लिख रहा था…

अगली रात फिर बहुत पानी बरसा और विज्ञापन वाली लड़की मुस्कुराती रही!

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Sita Sings the Blues

Sita Sings the Blues

I have really something great to share. This time about a film titled ‘Sita Sings the Blues’. This movie is remarkable not for only it’s feature-length animated treatment of the Ramayana, that has well worth every minute of your time, or  just for wonderful elements of mythology with the winsome voice of Jazz singer Annette Henshaw.

This  film is remarkable because it shows how one person with a laptop and something to say can make a masterpiece. This is  more remarkable because of it’s attitude to a film as a part of open source.

This film was  directed by Nina Paley, an American cartoonist, animator and free culture activist. She was the artist and often the writer of comic strips Nina’s Adventures and Fluff, but most of her recent work has been in animation. She released this film on the Internet under the Creative Commons License.

This movie uses an unique distribution system. It was released for free download starting in early March, 2009 “at all resolutions, including broadcast-quality, HD, and film-quality image sequences”, licensed under the Creative Commons Attribution-Share-alike 3.0 Unported license. The freely downloaded files will count as “promotional copies” and will thus be exempt from payments to the copyright holders of the songs.

She puts a welcome note on movie’s official site:

I hereby give Sita Sings the Blues to you. Like all culture, it belongs to you already, but I am making it explicit with a Creative Commons Attribution-Share Alike License. Please distribute, copy, share, archive, and show ‘Sita Sings the Blues’. From the shared culture it came, and back into the shared culture it goes. You don’t need my permission to copy, share, publish, archive, show, sell, broadcast, or remix Sita Sings the Blues. Conventional wisdom urges me to demand payment for every use of the film, but then how would people without money get to see it? How widely would the film be disseminated if it were limited by permission and fees? Control offers a false sense of security. The only real security I have is trusting you, trusting culture, and trusting freedom.

‘Sita Sings the Blues’ has won a number of awards.  Though it creates a lot controversy around it. In April 2009, a group called the Hindu Janajagruti Samiti started a petition demanding “a complete ban on the movie and initiation of legal action against all those who have been involved in production and marketing of this derogatory act against the entire Hindu community.

Eminent critic and writer Amitava Kumar worte abot this film:

The film returns us to the message that is made clear by every village-performance of the Ramlila: the epics are for everyone. Also, there is no authoritative narration of an epic. This film is aided by three shadow puppets who, drawing upon memory and unabashedly incomplete knowledge, boldly go where only pundits and philosophers have gone before. The result is a rendition of the epic that is gloriously a part of the everyday.