पटाखाः इसी लाउडनेस में इसका सौंदर्यबोध है

‘पटाखा’ जैसी फिल्में ज्यादा बननी चाहिए। इसलिए नहीं कि यह बहुत कलात्मक फिल्म है या इसमें कोई महान संदेश है। सिर्फ इसलिए कि यह मौलिक है। यह एक ठेठ देसी कलेवर वाली भारतीय फिल्म है। जो उतनी ही लाउड है जितने हम भारतीय अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में होते हैं। इस फिल्म में विदेशी फिल्मों की तरह कलर टोन नहीं सेट की गई है। यह तो भड़कीले रंगों वाली, तीखे, चटपटे संवादों वाली और इमोशंस के हैवी डोज़ वाली फिल्म है। इसमें कड़ाही में छने गर्म समोसों या चाट जैसा स्वाद है, जो जुबान (यानी आपके सौंदर्यबोध) पर थोड़ा भारी पड़ेगा मगर स्वाद भी खूब आएगा।

और सबसे बड़ी बात कि अब तक अपनी अभिव्यक्ति को शेक्सपियर और रस्किन बांड में तलाशने वाले विशाल भारद्वाज ने इस बार हिन्दी के एक ऐसे लेखक की कहानी चुनी है, जिसे हिन्दी वाले भी अभी बहुत अच्छे से नहीं जानते हैं। चरण सिंह ‘पथिक’ की क़िताब है ‘पीपल के फूल’ और उसकी कहानी ‘दो बहनें’ पर आधारित है यह फिल्म। इस कहानी में लोककथाओं जैसी सादगी है। “एक समय की बात है एक गांव में दो बहनें थीं, जिनकी आपस में जरा भी नहीं बनती थी…” ऐसे ही तो शुरू होती हैं हमारी कहानियां। इसके बाद ये कहानियां भागती हैं। खूब उतार-चढ़ाव होते हैं और अंत तक आते-आते आपकी आंखें भीग जाती हैं या भीगें न भी तो थोड़ी सी नमी आ जाती है क्योंकि यह आपको अपनी सी कहानी लगने लगती है।

हमारी इन भारतीय कहानियों की बुनावट में एक खास बात होती है उसके किरदार। हर चरित्र का अपना एक अलग रंग होता है। दो बहनों की इस कहानी को सान्या मलहोत्रा और राधिका मदान ने खूब रंग दिए हैं। उनके लिए जो संवाद लिखे गए हैं जो स्क्रीन पर दुर्लभ ही कहे जाएंगे। इसमें हमारी हिन्दी की खूबी यानी कि उसका ‘देसी विट’ भी मौजूद है जो हम अक्सर बसों, सैलून, रेलवे प्लेटफार्म और छोटे शहरों के बाजार में सुनते हैं। सुनील ग्रोवर इस फिल्म की बैकबोन हैं। वे सूत्रधार की भूमिका भी निभाते हैं और हर मोड़ पर कहानी के एक विशिष्ट किरदार की भी। विजय राज हमेशा की तरह शानदार हैं और इस फिल्म के सबसे बेहतरीन अभिनेता कहलाए जाने के हकदार भी।

फिल्म बेहद लाउड है और इसी लाउडनेस में इसका सौंदर्यबोध है। बड़े हिस्से में बहनों की मार-पिटाई और झगड़ा है। भागदौड़ है। चीख-चिल्लाहट है। और इन सबके बीच संगीत भी है। गुलजार का लिखा गीत ‘एक तेरो बलमा, एक मेरो बलमा’ को सुनिधि चौहान और रेखा भारद्वाज ने सुंदर गाया है और विशाल भारद्वाज ने मौलिक अंदाज में फिल्माया भी है। यह एक विशुद्ध मनोरंजन वाली फिल्म है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे देखकर आपको किसी देसी-विदेशी फिल्म की याद नहीं आएगी। और यही निर्देशक विशाल भारद्वाज की सफलता है।

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‘मनमर्जियां’ अनुराग कश्यप की फिल्म नहीं

‘मनमर्जियां’ अनुराग कश्यप की फिल्म नहीं है।

इस फिल्म में अनुराग कश्यप सिरे से गायब हैं। सिर्फ गाहे-बगाहे बिना किसी रचनात्मक संदर्भ के दो लड़कियां फ्रेम में कूदकर आ जाए तो भले आपको ‘देव डी’ का इमोशनल अत्याचार या ‘गुलाल’ के पियूष मिश्रा या ‘बांबे वेल्वेट’ का जैज़ याद आ जाए और आप कहें- ‘अरे हां, ये तो अनुराग वाला स्टाइल है।’

‘मनमर्जियां’ उन कुछ फिल्मों में से है जिनको देखकर यह नहीं समझ में आता कि उन्हें बनाया क्यों गया है। सिर्फ एक अच्छी लोकेशन में सामान्य से अच्छा अभिनय करा लेना, थोड़ी प्रामाणिकता और कुछ शॉकिंग एलिमेंट से क्या कोई फिल्म अच्छी बन जाती है? उकताहट की हद तक प्रिडिक्टबल स्टोरी लाइन… यानी ‘तनु वेड्स मनु’ और ‘हम दिल दे चुके सनम’ का मिडल क्लास पंजाबी फैमिली संग कॉकटेल। जब निर्देशक यह स्टैबलिश कर दे कि हमारी नायिका तो मूडी है। उसके दिमाग का ठिकाना नहीं कि वह कब क्या कर बैठेगी? फिर तो आप ठंडी सांस लेकर अपनी सीट पर बैठे रहते हैं – चल, दिखा अपना मनमौजीपना, हमने तो टिकट ले ही लिया है।

अनुराग की खूबी यह है कि वे टाइप्ड किस्म का वातावरण नहीं रचते हैं। इधर अनुराग ने यथार्थ में हास्य को पिरोने की अद्भुत क्षमता हासिल की है। उसके छींटे ‘मनमर्जियां’ में जहां-तहां मिलेंगे। अगर स्पॉइलर का डर न हो तो मैं क्लाइमेक्स की तारीफ करना चाहूंगा। तो करूं उसकी चर्चा? नहीं? अरे, जिस फिल्म के शुरू होने के 20 मिनट बाद ही उसका अंत आपको समझ में आ जाए तो अब स्पाइलर की चिंता लेकर बैठने से क्या फायदा। तो इसका क्लाइमेक्स अपेक्षाकृत खूबसूरत मगर बासी है।

एक शांत दृश्य। फिल्म का नायक अभी-अभी तलाक के बाद बाहर आता है। अभी-अभी भूतपूर्व बनी अपनी पत्नी से कहता है- चलो मैं तुम्हें घर तक छोड़ देता हूँ। … और तब वो एक-दूसरे को अपने बारे में बताना शुरू करते हैं। यह किसी ईरानी सिनेमा में दिखने वाले खूबसूरत प्रसंग जैसा था। काश, पूरी फिल्म की बुनावट ऐसी ही होती। खैर, ऐसा प्रयोग मेरे प्रिय निर्देशक प्रियदर्शन बहुत पहले ‘डोली सजा के रखना’ फिल्म में कर चुके हैं। जिसका क्लाइमेक्स एक बंद कमरे में चाय पीने के दौरान ही समाप्त हो जाता है।

निर्देशक तो खैर अनुराग भी मेरे प्रिय हैं। ‘अग्ली’ देखकर मन में आया कि बहुत हो चुका… ये जबरदस्ती की डार्कनेस से बाहर निकलना होगा अनुराग को। ‘मुक्काबाज’ में उनकी बदली शैली देखकर खुशी हुई। मगर ये क्या? इतना बदलने की जरूरत थोड़े ही थी… कि पहचान में ही न आए।

अब अगर ये अनुराग की फिल्म होती तो क्या होता? तो यह उसी तरह की होती जैसी शुरू के 20 मिनट तक थी। मगर उसके बाद उम्मीद थी कि हम परत-दर-परत किरदारों और परिवेश के भीतर धंसते जाएंगे। अनुराग हमें धीरे-धीरे हमें एक अंधेरी दुनिया और मन के अंधेरे कोनों की तरफ ले जाएंगे। यह भी संभव था कि फिल्म उतनी स्याह न हो, तो भी…

तब भी कुछ ऐसा उद्घाटित होगा जो अबसे पहले नहीं देखा था। सत्तर के दशक की एक चर्चित, सिनेमाहाल तक न पहुंच सकी कला फिल्म थी ‘त्रिकोण का चौथा कोण’ यह एक ऐसा प्रेम त्रिकोण था जिसमें दो स्त्रियां और एक पुरुष एक साथ रहने का फैसला कर लेते हैं। ‘मनमर्जियां’ में कहीं एक जगह जाकर कुछ ऐसा कौंधता है कि शायद इस त्रिकोण में तीनों के रास्ते अलग हैं। हमें वहीं अंत क्यों देखना चाहिए जैसा कि हम बार-बार देखते आए हैं?

‘देव डी’ जैसी लाल-पीली रोशनियों से अनुराग का अनुराग यहाँ भी दिखता है और थकाता है। संगीत का अतिरेक भी थकाता है क्योंकि कहानी में उत्तेजना नहीं है। तो यहां संगीत उनकी पिछली फिल्मों की तरह कहानी को धक्का नहीं देता। फिल्म का हास्य भी कुछ समय बाद कहानी में रचा-बसा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि निर्देशक ने इशारा किया और अब ये पात्र दर्शकों को हंसाना चाहते हैं। अब सवाल ये है कि फिल्म में अच्छा क्या है? एक प्रामाणिक परिवेश, जिसमें गली-कूचे, पारिवारिक बैकग्राउंड, घरों के अंदर की साज-सज्जा, कपडे़, हेयर स्टाइल, लोगों के बात करने-चलने का तरीका आदि शामिल है। कोई शक नहीं कि इसमें अनुराग मास्टर हैं।

मगर कुल मिलाकर… ‘मनमर्जियां’ अनुराग कश्यप की फिल्म नहीं है।

उड़नखटोला

पिछले कुछ दिनों से वह ठीक से सो नहीं पा रहा था। यह एक समस्या बनती जा रही थी। वह नींद के प्रति सचेत होने लगा था। यह अक्सर बचपन में बुखार के दौरान आई अधपकी नींद जैसा होता था। जब बदन की तपन बंद आंखों के भीतर तैरते चकत्तों को आहिस्ता-आहिस्ता डुलाती रहती थी।

उस नींद की तरह- जब पसीने से भीगे बदन और गर्म सांसों से रात को इंच-दर-इंच नापना पड़ता था। जब जिद्दी प्रेत की तरह कोई एक घटना या वाक्य सपनों से चिपका रहता था। सपने हवास पर गर्म राख की तरह फैले होते थे और हर करवट पर दिमाग चकरघिन्नी की तरह दिन भर की तस्वीरें उलटता-पलटता रहता।

हां, बचपन में इसी तरह सपने साथ-साथ चला करते थे। उसके लिए याद कर पाना काफी मुश्किल था कि जीवन की सबसे पहली स्मृतियां नींद का हिस्सा थीं या असल जिंदगी का।

मैं शायद पांचछह बरस का था। एक ठिठुरती सुबह मैंने खिड़की से बाहर झांका। हर तरफ सफेदी फैली थी। कई सालों बाद मौसम ने ऐसी करवट बदली थी। रोशनदान और ईंटों के बीच खाली गर्म जगहों में कबूतर ऊंध रहे थे। उन दिनों आंगन में रखी अंगीठी में कोयला सुलगता रहता था। अक्सर एक रॉडार की शक्ल का रूम हीटर बंद कमरे के नीमअंधेरे में नारंगी रोशनी बिखेरता रहता। घर में पड़ी सोवियत रूस के चिकने पन्नों वाली पत्रिका में खरगोश और भेड़िया भी बाहर फैले सफेद कुहरे जैसी बर्फ पर फिसलते नजर आते। मैं एक डगमगाती साइकिल के आगे बैठा गीली सलेटी सड़क पर आगे बढ़ता जाता। मुझे हर तरफ सफेद धुंध नज़र आतीजो आगे बढ़ने के साथ और गहरी होती जाती। इस अनजान मंजिल की तरफ बढ़ते जाना जैसे मेरी नियति बन जाती थी।

उन दिनों वह अक्सर धुंध से होकर गुज़रने का यह सपना देखा करता था। इस सपने से वह खुद को इतना आत्मसात कर चुका था कि सुबह-सुबह की ठंडी बयार और सूरज उगने से पहले पश्चिम में छाया सुरमई अंधेरा भी उसे किसी स्वप्न जैसे ही लगते थे। आंखें मलते, खाली मैदान में दौड़ती गायों और उनके कदमों से क्षितिज में उठती धूल देखकर वह चकित हो जाता था। वह दौड़कर मां के करीब पहुंचता और उनसे पूछता था, “आखिर यह दुनिया कितनी बड़ी है… क्या इसका कोई अंत भी है?”

जीवन की उन पहली स्मृतियों की तरह पहले-पहल देखे गए सपनों की यादें भी उसके मन के अंधेरे कोने में बसती चली गईं। वह अपनी बचपन की नींद को कभी भी याद कर सकता था। तीन-चार बरस उम्र से ही रोशनदान से छनती चांदनी, कमरे के मुलायम अंधेरे में मां के बदन से आती महक और पिता के हाथों का स्पर्श उसकी नींद का हिस्सा बन चुके थे।

रात को खाने के बाद मां से बातें करते हुए उसके पिता अपनी उंगलियों से उसका माथा सहलाते रहते। उनकी उंगलियों में एक महीन सा खुरदरापन था। जैसे किसी पुराने वृक्ष के तने में होता है। उस स्पर्श के साथ जब वह आंखें बंद करता तो बंद पलकों के आगे महीन पीली रोशनी से बना जाल तैरने लगता। कुछ ही पलों में तेजी से भागता वह रोशनी का पैटर्न बैगनीं-नीले फूलों में बदल जाता था। उसका पलंग जैसे एक उड़नखटोले में बदल जाता था। पलंग आहिस्ता-आहिस्ता उपर उठने लगता। सितारों भरे आसमान में एक डगमगाती सी छलांग के साथ ही वह अपनी चेतना खो बैठता।

चेतना खो बैठना… उसके लिए नींद का सबसे बड़ा जादू यही था। हर सोलह-सत्रह घंटे बाद मौत की दहलीज तक जाकर उल्टे कदमों से लौट आना। हर वापसी के बाद जिंदगी को नए सिरे से जीना… यह बचपन में ही संभव होता है। बड़े होने के बाद वह अक्सर सोचता था कि शायद जानवर और परिंदे ही हर रोज जगने के बाद एक नया जीवन जीते हैं। उम्र का एक हिस्सा रात को उनके सोने के साथ ही खत्म हो जाता है, अगली सुबह नींद खुलने पर वे एक नए जीवन को दस्तक देते हैं।

हां, बचपन के दिन अब स्वप्न जैसे लगते हैं। रात में मेले की परछाइयां, बादलों में कौंधती बिजली, झूले का ऊपर-नीचे होना, पानी की बाल्टी में डोलता सूरज का प्रतिबिंब, चमकीली धूप में हवा से फरफराती रंगीन फिरकियां… धूप-छांह-धूप… फिर सपना… अक्सर जमे हुए खून के कत्थई थक्के उसे आधी रात की नींद से जगा देते थे।

तुम जब हड़बड़ाकर उठते तो खिड़की के बाहर झरती चांदनी और मां और पिता की सांसों की आवाज भर सुनाई देती। दोबारा सोने की कोशिश करने पर आंखों के आगे वह नन्हा परिंदा फड़फड़ाने लगता जो उस दिन भी उड़ने की कई असफल कोशिशों के बाद सीढ़ियों पर सिमटा बैठा था। शायद घोसले से नीचे गिर गया था। हाथ बढ़ाकर उस भूरेकत्थई परिंदे को वहां से हटाना चाहा था तो हथेली को सिर्फ पक्षी की धड़कन, नुकीले पंजे और पंखों की फड़फड़ाहट से उपजा प्रतिरोध ही हासिल हुआ। तुम चुपचाप घर लौट गए थे। तुमने सोचा कि घर पर यह बात कहो मगर किसी अनजान सी शर्मिंदगी के चलते चुप रहे। दोपहर में जब तुम दोबारा उन सीढ़ियों से उतरे तो चिड़िया का वह नन्हा बच्चा मृत पड़ा था। उसके शरीर से बहा रक्त एक वृत की शक्ल में जमकर कत्थई सा हो गया था। चींटियों की एक कतार उसके शरीर की तरफ जा रही थी। वह अनजाने में किसी के भारीभरकम जूते से कुचल गया था।

उस घटना के बाद वह कई दिनों तक उदास रहा। शायद वह नन्हा परिंदा किसी बड़े शख्स के भारी-भरकम जूते से सीढ़ियां उतरते वक्त कुचल गया था। कई महीनों तक वह खुद को इस अपराध के लिए गुनहगार मानता रहा। यह सोचकर कि परिंदा बच सकता था, उसके भीतर से एक तकलीफ सी उमड़ने लगती। यह एक बेतुकी मौत थी। रक्त का कत्थई धब्बा कई दिनों तक बचपन के सपनों में तैरता रहा।

वह थोड़ा बड़ा हुआ तो रात से उसकी दोस्ती गहराने लगी। दिन और रात किसी अनजान कहानी के छोटे-छोटे अध्याय में बदल गए। रात होती थी तो दुनिया बदल जाती थी। लोग बदल जाते। यहां तक कि खुद की परछाईं भी उसे बदली-बदली सी नजर आती थी। पेड़ों की पत्तियों से गुजरती हवा की सरसराहट का रात में अलग ही रंग होता था। तब कई बार उसे लगता था कि रात के अंधेरे में चमकती चांदनी के पीछे कोई राज छिपा है। उन परछाइयों और रोशनियों के बीच कुछ ऐसा था जो मेरे भीतर आकार ले रही स्मृतियों की श्रृंखला से बहुत पहले का कोई अनजाना सच सिर्फ और सिर्फ मुझसे साझा करना चाहता था। मेरे मन में कुछ उमड़नेघुमड़ने सा लगता और मैं चुपचाप अपनी मां के बगल में जाकर बैठ जाता।

***

 

मां की बगल में न जाने कब उग आया यह मौन अकेलापन धीरे से उसके बचपन में दाखिल हो गया। देखते-देखते मां के सुंदर चेहरे पर टिकी रहने वाली बिंदी- जिसे वह अक्सर उनके माथे से उतारकर खेलता था- गायब हो गई और कनपटियों पर जाने कब आहिस्ता-आहिस्ता सफेदी उतर आई। शाम को आठ बजे दरवाजे पर दस्तक नहीं होती थी और न किसी पुरुष की गरमाहट भरी मौजूदगी उन दोनों की आंखों में चमक बनकर उतरती।

हां, शाम को आठ बजे के बाद मेरा दिल डूबने लगता। मां मुझे गोद में उठाए अक्सर डाक्टर के पास भागती। एक वर्ष तक यह सिलसिला चलता रहा। फेफड़ों में सांस समा पाने से हो रही उफनाहट, अंधेरे के साथ हर तरफ फैलती उदासी की छाया, मां का आंखों में चिंता लिए सपाट चेहरा, टेबल पर नजर आने वाला थर्मामीटर, पेन स्टैंड, पेपरवेट और शीशियों टेबलेट से भरी एक लोहे की अलमारी। एक बरस। आखिर मैंने अपने अवसाद से दोस्ती कर ली। आठ बजे तक मां काम खत्म करके कमरे की बत्तियां बुझाकर उसके बगल में लेट जाती। हम या तो आपस में बातें करते या रेडियो से उठती धुनों को सुनते।

रात के अंधेरे में उठती कुछ धुनें अपने साथ फिर वही पुराना अवसाद लपेटे आती थीं। क्योंकि उन धुनों के आगे-पीछे किसी के कदमों की आहट थी। साथ में थी अख़बार में लिपटी तली मछलियां और चेहरे पर उंगलियों की खुरदरी सी छुअन। उस धुन को सुनते ही उसे लगता उसके जीवन से कुछ छिनने जा रहा है। उसका दिल डूबने लगता था। कमरे की अंधेरी परछाइयां और गहरी हो जाती थीं। लगता था कि सांस फेफड़ों में समाने की बजाय वापस लौट जा रही है। मगर अपनी इस घबराहट को वह राज रखता। आखिर इतना समझदार हो गया था कि अपनी मां से वह बहुत कुछ छिपा सके- जिसके कारण उन्हें तकलीफ पहुंचती थी। मां-बेटे किसी अनकहे समझौते के चलते अपने अनिश्चित भविष्य के बारे में बातें नहीं करते थे। वे किसी अनकहे समझौते के चलते पिता के बारे में भी बात नहीं करते थे।

तुमने पिता को आखिरी बार देखा था तो लगा था कि वे सो रहे हैं। सिर्फ उनके होठों के कोने से बही एक खून की लकीरजो सूखकर लगभग काली सी नजर रही थीउनके चेहरे को कुछ अजीबसा बना रही थी।

पिता की मौत उतनी ही बेतुकी थी जितना परिंदे का जूते से कुचला जाना। उन्हें एक जीप ने टक्कर मार दी थी। उनका चश्मा और हाथ में तली हुई मछलियों का पैकेट छिटकर कर दूर जा गिरा था। लोग बताते हैं कि जीप चलाने वाले की कोई खास गलती नहीं थी। वह अभी गाड़ी चलाना सीख रहा था। सामने से आ रही ट्रक देखकर वह हड़बड़ा गया, इसी हड़बड़ाहट में उसका पांव ब्रेक की जगह एक्सीलेटर पर चला गया। उसी रोड पर एक सुरक्षित किनारे उसके पिता तली हुई सोंधी खुशबू वाली मछलियां लेकर घर जा रहे थे। वह अपने समय से एक घंटे लेट आ रहे थे। क्योंकि उसकी जिद पर वे उस दिन रास्ता बदलकर मछली खरीदने चौक की तरफ चले गए थे। जब जीप लहराती हुई फुटपाथ और किनारे की दीवारों को रगड़ती हुई पोल से जा टकराई तो पिता का उसी वक्त, उसी जगह पर होना कतई जरूरी नहीं था।

वह तब उम्र में छोटा और नासमझ था। इतना ज्यादा नासमझ कि जिस दिन पिता को घाट पर जलती लकड़ियों के हवाले किया गया तो लौटते वक्त वह किसी की बात पर मुसकराने भी लगा था। दरअसल चिता से लपटें उठनी शुरु हुईं तभी उसका मन हल्का हो गया था। उस दिन बेहद सुंदर बयार चल रही थी। घाट पर आबनूस जैसा काला व्यक्ति ढेर सारी कागज की रंग-बिरंगी फिरकियां लिए घूम रहा था। जो तेज हवा में फरफरा रही थीं।

बाद में अपनी इस नासमझी पर वह काफी शर्मिंदा भी हुआ। इसका अफसोस उसे बहुत दिनों तक रहा। खुद को शर्मिंदा करने के लिए वह एक बंद कमरे में खूब फूट-फूटकर रोया भी। शुरु के कुछ महीनों तक पिता की गैरमौजूदगी का एहसास उसे शाम को आठ बजे के आसपास होता था। यह उनके घर आने का वक्त था। उसका जी घबराने लगता था और वह चादर से मुंह ढककर सोने की कोशिश करने लगता। चेहरे पर लिपटा अंधेरा एक दरवाजा था- दूसरी दुनिया में कदम रखने का।

यहीं मैंने नींद से दोस्ती कर ली। यह एक आसान रास्ता था। बेहतर विकल्प। मैंने सपनों को टोहना शुरु कर दिया। जिंदगी समझ से बाहर, अनिश्चय से भरी और डरावनी थी। जबकि जीवन का हर सुखद टुकड़ा एक स्वप्न था। हर स्मृति एक स्वप्न थी। हंसी एक स्वप्न थी। ये नींद के स्याह सागर में तैरती उम्मीदें थीं। मैं सपनों के पीछे किसी शिकारी की तरह लग गया। नींद के अंधेरे जंगल में स्वर्ण मृग जैसे स्वप्न चमकते और गायब हो जाते। जितना ही उनके करीब जाने की कोशिश करो उतना ही उन्हें पकड़ पाना कठिन होता जाता था।

वहीं उसकी वास्तविक दुनिया में अनिश्चितता बढ़ती जा रही थी। पिता की मौत के बाद वह अपनी मां के साथ छिटक कर जैसे वक्त के हाशिए पर चला गया था। घर के पुराने साल-दर-साल बदरंग हो रहे दरवाजे के पीछे घड़ी की सुइयां ठहर गई थीं। उस दरवाजे के पीछे कुछ घटित नहीं हो रहा था। सिवाय इसके कि मां वक्त बीतने के साथ बूढ़ी और एकाकी होती जा रही थीं। उनके सुंदर चेहरे पर झुर्रियां नज़र आने लगी थीं। मां के पास एक लकड़ी की बनी सुंदर सी संदूकची थी। वे उसे कलमदान बोलती थीं। उसके भीतर कई खांचे बने हुए थे। उसमें वह अपनी पुरानी डायरी, पेन और खत रखती थीं। अपनी डायरी वे उस देखने नहीं देती थीं। हालांकि वह जानता था कि मां ने उसमें दूसरी किताबों में पसंद आने वाले शे’र और कविताएँ लिख रखी हैं। कई बार वे खुद भी कुछ लिखने की कोशिश करती थीं, मगर बाद में संतुष्ट न होने पर या तो अपनी पंक्तियां काट देती थीं या वह पृष्ठ ही फाड़ देतीं। पीले पड़ गए कागजों और पुराने टाइप के अंतर्देशीय में किसके खत थे, जिन्हें वो अकेले में पढ़ती थीं- यह उसके लिए एक रहस्य था।

हर बारिश के बाद घर की छतों पर और ज्यादा पपड़ियां जमने लगी थीं और दीवारों पर उगी काई का रंग और गहरा होता जाता था। घर के पिछले हिस्से में आंगन की बिना पलस्तर वाली दीवार में एक दरार पड़ गई थी। वक्त बीतने के साथ मां बेटे के बीच संवाद कम होता जा रहा था। वे अदृश्य गलियारों में अलग-अलग एक-दूसरे की विपरीत दिशा में चल रहे थे।

अनिश्चय एक बाघ बनकर तुम्हारी नींद में दाखिल होता था। अपनी आंखों में एक निर्विकार हिंसा लिए। टूटे हुए खंडहरों या खाली फैली छतों पर टहलता। तुम जंगले से उसे देखते और दरवाजे बंद करना शुरू कर देते थे। वह एक निश्चिंतता लिए खुली छत पर लोटता रहता। उसके गले से निकलती खिलंदड़ी गुर्राहट कमरे के भीतर सुनाई देती रहती। तुम भयभीत खिड़कियों से झांकते रहतेउसके पूरी तरह चले जाने की प्रतीक्षा में।

हर बारिश में दीवार की दरार और बढ़ जाती थी। वह कई बार उत्सुकता से दरार के भीतर झांकता था। दरार के भीतर उसे एक पूरी दुनिया नजर आती थी। वहां हरी काई का जंगल उग आया था। गर्मियों में चमकीले कत्थई कैटरपिलर के झुंड उसके भीतर अलसाये भाव से रेंगते नजर आते। कभी कपास का नन्हा सा फूल उस दरार में जाकर अटक जाता तो कभी चींटिंयों का झुंड मार्च करता हुआ वहां से गुजरता था। सर्दियों में छिपकलियां उस दरार के भीतर गहन निद्रा में सोती दिखाई देती थीं। आंगन की उस दरार के दूसरी तरफ बाहर का संसार तेजी से बदल रहा था। युवा होती लड़कियां ज्यादा आत्मविश्वास से चहकती नजर आती थीं। गली में क्रिकेट खेलते लड़के उन्हें देखकर और दम लगा देते या बॉल कैच करने के लिए कलाबाजियां खाना शुरु कर देते।

तुम्हारे लिए वे सभी दुसरी दुनिया का हिस्सा थे। तुम उस दुनिया का हिस्सा चाहकर भी नहीं बन सकते थे। तुम कभी अगर उनके बीच से होकर गुजरते भी तो लगता जैसे सपनों से निकली कोई भुतैली परछाईं अटपटी चाल से चलती उन लड़केलड़कियों के बीच आकर खड़ी हो गई हो। तुम्हारी जुबान सिल जाती।

अक्सर वह काफी शर्मिंदा होकर लौट जाता और रात को खाली कमरे में चहलकदमी करते हुए अपनी कल्पना में उन लड़कों या लड़कियों से आत्मविश्वास भरा संवाद करने की कोशिश करता। चलते-चलते जब थक जाता तो बिस्तर पर लेटकर आंखें बंद कर लेता। एक बार इसी तरह थककर वह अपने कमरे में सोया ही था कि कुछ गिरने की आवाज आई।

यह मां थीं जो बाथरूम जाते समय आंगन में फिसल गईं। बीते पांच-छह दिनों से उनकी दवा खत्म हो गई थी। बढ़े रक्तचाप के कारण शायद उनका सर चकरा गया और वे गिर गईं। उनकी नाक से गर्म रक्त की एक लकीर बह पड़ी जो उनकी साड़ी पर बड़े-बड़े धब्बे बना रही थी। उसका रंग कुछ वैसा ही स्याह था जैसे उस नन्हीं चिड़िया के बच्चे के तन से निकला था या पिता के होठों के कोर पर जम गया था। मां को काफी चोट आई थी। कंधे और पीठ का हिस्सा स्याह पड़ गया था और बहुत दिनों तक उनका शरीर इस कदर अकड़ा रहा कि उठने-बैठने के लिए भी उन्हें सहारा चाहिए था।

इस घटना का उसकी नींद पर गहरा असर पड़ा। उसे अपनी लापरवाही पर कई दिनों तक अफसोस रहा। उसे बड़ी तीव्रता के साथ यह अहसास हुआ कि किसी तरह मां के न होने पर वह बिल्कुल अकेला हो जाएगा। सिर्फ मां ही उसके अतीत की मौन साझीदार थी। उस घटना के बाद से वह कच्ची नींद सोने लगा था। मां को डायबिटीज़ था और इसके कारण उन्हें बार-बार बाथरूम जाना पड़ता था। रात को मां कांपते-डगमगाते कदमों से बाथरूम की तरफ लपकतीं तो उनके चप्पलों की घिसटती आवाज से उसकी आंखें फट से खुल जातीं और वह लपक कर उन्हें थाम लेता। ऐसा रात में कम से कम दो बार होता था।

धीरे-धीरे मां के चप्पलों की आहट उसकी नींद में दाखिल होती गई।

रात को उसे कई बार उठना होता था। इस आधी-अधूरी नींद में वह धीरे-धीरे उस दहलीज को बेहद करीब से पहचानने लगा था, जहां से लोग सपनों के भीतर कदम रखते हैं। जब वह उनींदा होता था तो आसपास की हलचल धीरे-धीरे उसकी संवेदनाओं को छुए बगैर निकलने लगती थीं। यह ठीक वैसे होता था जैसे पानी के भीतर जाने पर हम सिर्फ अपने चारो तरफ मौजूद पानी के एहसास को जी रहे होते हैं। आसपास की आवाजों से निर्लिप्त उसका मन धीरे-धीरे किसी एक विचार की तरफ केंद्रित होने लगता था। और एक झपाटे के साथ पुरानी स्मृति चील की तरह उसके वर्तमान में दाखिल होती थी। एक अनायास बिंब- जो उसकी प्रत्याशा से बाहर की चीज होती थी।

मेरा अपनी नींद के प्रति सचेत होना दरअसल वास्तविक दुनिया और सपनों के बीच एक पुल बनाता जा रहा था। इसका नतीजा यह होता था कि नींद के हर झोंके के दौरान मेरे दिमाग में बिजली की एक कौंध सी उठती थी। उस कौंध में जो मुझे जो कुछ दिखता वह हकीकत और सपनों के परे था। इतना ही नहीं वह स्मृति, कल्पना या विचार जैसे खांचों में भी नहीं बंटा था। यहां मेरे लिए सब कुछ एक मिश्रित अनुभूति में बदल जाता था। हर कल्पनामय बिंब की जड़ें अतीत की किसी स्मृति में थीं और हर स्मृति की गहराई में कोई विचार घुलामिला होता था। एक दिन एक ऐसी ही कौंध हुई और मुझे लगा कि आने वाले दिनों में हमें दिख रही दुनिया सपाट नहीं रह जाएगी, वह हर तरफ फैली होगी। दसो दिशाओं में।

और उन्हीं दिनों उसने अपनी जिंदगी का सबसे अद्भुत स्वप्न देखा। एक जगमगाता सुंदर शहर- जो सपाट धरती पर नहीं था- पेड़ों की शाखाओं की तरह हजारों किलोमीटर आसमान की तरफ फैला हुआ था। यह एक काली रात थी- जिसमें सुनहरी रोशनी का जाल बिछा हुआ था। वैसी ही रोशनी- जैसी वह बचपन में आंखें बंद करने पर अपने उड़नखटोले में देखता था।

***

यहां तक आते-आते शहर की आवाजें डूब चुकी थीं। सिर्फ उसकी टिमटिमाती बत्तियां नजर आ रही थीं। ऊपर आसमान तारों से भरा था। इतने तारे उसने कभी नहीं देखे थे। ऐसा आसमान सिर्फ बचपन में अपने पिता के साथ नेपाल की तराई के खुले मैदानों में देखा था। इस आसमान में सप्तऋषि भी पहचाने जा सकते थे और एक क्षितिज से दूसरे तक जाती धुंधली आकाशगंगा भी।

वे छत पर थे। अंधेरा था मगर उसका चेहरा तारों की रोशनी में नजर आ रहा था। क्योंकि वह उसके बहुत करीब थी। शायद उसकी इजाजत से वह उसे छू भी सकता था। वह उसके लिए ट्रे में चाय लेकर आई थी। जब कोई लड़की पहली बार हमारी जिंदगी में दाखिल हो रही होती है तो वह दरअसल खुद में एक जिंदगी की तरह होती है- जिसके भीतर हम दाखिल हो रहे होते हैं। मैं उसके भीतर दाखिल हो रहा था। वह धुआँ थी। वह परछाईं थी। वह स्वप्न थी। मैं स्वप्न के भीतर दाखिल हो रहा था। जब मैंने पहली बार उसे देखा था तो घनघोर बारिश हो रही थी। पानी से तरबतर वह भी उसी पुराने मकान के बरामदे में खड़ी हो गई, जहां मैं पानी के रुकने का इंतजार कर रहा था। उसके माथे, पलकों, बरौनियों पर बूंदें अटकी हुई थीं। मैंने बाहर आसमान की तरफ झांका जो स्लेटी बादलों से ढका हुआ था। दिन का उजास लगभग खत्म था। ये बादल मेरी जिंदगी में फिरफिर वापिस आते थे। स्मृतियों से डबडबाए और अनिश्चित भविष्य की कौंध लिए।

हमें चलना है ?”  उसकी आवाज अंधेरे को चीरती हुई टकराई।

हां, हमें चलना है।

मैं करीब आने पर उसकी आंखों में जगमगाते शहर को देख सकता हूं। यह वही शहर है जो मैं देखना चाहता था। उसकी सांसें मुझसे टकरा रही हैं। देखो, मेरे बचपन के सपनों की वह सुनहली रोशनी उसके बालों और चेहरे पर उतर आई है। मैं पलटा। मेरे सामने आसमान तक फैला वह शहर था। आसमान तक जगमगाती मद्धम पीली रोशनियों का जाल। जैसे रात को पर्वतों के बीच गुजरने पर शहर तलहटी से आकाश तक टिमकता दिखता है। वह मुझसे एक कदम आगे थी। उसने पीछे मुड़कर मेरा हाथ थाम लिया। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक थी। हर आगे बढ़ते हुए शहर के भीतर दाखिल हो रहे थे। शहर का बहुत सारा हिस्सा अंधेरे में डूबा हुआ था। हम खाली मकानों के बीच चांदनी रात में फैली भुतैली परछाइयों से होकर भटक रहे थे। खाली पड़े सैकड़ों कतारबद्ध मकान अपनी अंधी खिड़कियों से टकटकी लगाए किसी जैसे किसी अनजान आगंतुक की प्रतीक्षा में थे। मैं उसे लेकर एक छोटे से मकान के भीतर दाखिल हुआ। भीतर रोशनी नहीं थी। फर्श पर चांदनी के चौखटे जहांतहां बिछे थे। वह चुपचाप ठंडे फर्श पर बैठ गई। वह थकी सी लग रही थी।

दोनों कमरे के फर्श पर एक-दूसरे के करीब खामोश बैठे थे। एक वेदना से भरा संगीत उन दोनों के बीच किसी नदी की तरह बह रहा था। यह स्मृतिविहीन अस्तित्व था। यह स्वप्न एक पूरे जीवन जितना विशाल था। इस स्वप्न में उन दोनों के पास न कोई अतीत था और न भविष्य। उसे पहली बार अहसास हुआ कि बीते कल और आगत से छुटकारा पाना कितना सुखद हो सकता है।

इस स्वप्न को वह कभी भूल नहीं पाया। इस सपने में उसने एक पूरा जीवन जी लिया। ऐसा जीवन जिसको पाने के लिए शायद उसने जन्म लिया था मगर उस तक पहुंचने से पहले जागती आंखों के आगे फैले दुःसवप्न में उलझ गया। पहली बार उसे एहसास हुआ कि एक जीवन में कितने जीवन समाये हुए हैं। हर स्वप्न जो याद रह जाता है- किस तरह से स्मृतियों और समय की हदों को लांघ जाता है। काले, अंधेरे महासागर में बहते आइसबर्ग जैसे ये स्वप्न अपने भीतर चांदनी रातों की तरह राज छुपाए हुए थे। उनका वास्तविक जीवन से कोई सीधा संबंध न था। वे काल की सीमाओं से परे किसी अनंत से जा मिलते थे।

दिन छोटे होने लगे और रातें लंबी।

वह रात अक्सर जागते हुए गुजार देता था। नतीजा यह होता था कि दिन में उसे नींद के झोंके आने लगे। कभी भी, कहीं भी। कचहरी की बेंच पर। पार्क में। कई बार साइकिल चलाते वक्त। नींद अचानक बहते पानी की तरह गुजर जाती थी। सपने टुकड़ों में आते थे। ये स्वप्न उसके वर्तमान से आबद्ध होते थे।

जिस दिन वह नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया था, बाहर इंतजार करते-करते उसे नींद आ गई।

तुम्हारे पांव स्कूल के मैदान में अगस्त की बारिश में भीगी घास पर थे। सामने दुबलेपतले गांधीवादी टोपी लगाए प्रधानाचार्य खड़े थे। तुम सहमे हुए थे। अभीअभी तो तुमने गलती की थी। पता नहीं वे इस बारे में क्या सोचेंगे। क्या वे इस आफिस में शिकायत करने पहुंच जाएंगे? जहां तुम आज नौकरी मांगने आए हो? स्कूल के आगे आफिस के लोग भला क्या कर सकते हैं। तुम्हारी गलती तो प्रधानाचार्य को पता चल गई है। हो सकता है प्रेयर के बाद वे तुम्हें अपने कमरे में बुलाएं।

***

उसे जहां काम मिला था, उसका आफिस दवाओं और सर्जिकल सामानों के डिस्ट्रीब्यूटर्स से भरी एक मार्केट में था। वहां दिन भर बिजली न होने के कारण जनरेटर तड़तड़ाते रहते थे। उसे खिड़की के पास सीट मिली थी। तपती गर्मियों में कई बार जेनरेटर खराब होने की वजह से खिड़की खुली रखनी पड़ती थी। मार्केट की दीवारें बरसों से पुताई न होने कारण बदरंग हो गई थीं। खिड़की के ठीक सामने काई लगी दीवार पर बहुत धब्बे पड़े थे। खाली वक्त में वह उस बदरंग दीवाल में तरह-तरह की आकृतियां खोजा करता था। उसमे हरे रंग का एक धब्बा उसे ऐसा दिखता था मानों कोई कुत्ता मुंह फाड़कर भौंक रहा हो। धीरे-धीरे उस भौंकते कुत्ते की शक्ल वाले हरे धब्बे से उसकी पहचान-सी हो गई। कई बार वह बाहर देखता-देखता उनींदा हो जाता तो लगता कि हरे धब्बे में एक लहर सी दौड़ गई।

रात को ठीक से नींद न आना अब तक उसके एक समस्या बन गई थी। वह काफी दुबला और कमजोर भी हो गया था। लिहाजा नींद के झोंके उसे दिन में कई बार आते थे।

एक दिन वह हरा कुत्ता टहलता हुआ उसकी मेज के नीचे आ गया। क्या मुसीबत है…” वह बुदबुदाया। “…नींद कभी भी कहीं भी चढ़ बैठती है। मैं जगा हुआ हूं सो नहीं रहा हूं…” हरा कुत्ता बिना कुछ बोले मेज के नीचे सिकुड़कर बैठ गया। उसने ‘हुश!’ करते उसे भगाने की कोशिश की मगर वह टस से मस नहीं हुआ। वह दुविधा में था कि वह आफिस में सपना देख रहा है क्या? सामने की टेबल से लड़की फाइल लेकर उठी और उसकी तरफ आने लगी। सब कुछ ठीक लग रहा था और वास्तविक भी। यहां तक कि दीवार पर टिकटिकाती घड़ी भी लंच के बाद का समय ही दिखा रही थी। लड़की उसकी टेबल तक पहुंच गई। हरा कुत्ता मेज के नीचे दुबका रहा। आखिरकार खीजकर उसने कुत्ते पर ध्यान देना ही छोड़ दिया।

सपनों से दोस्ती का यह नया पड़ाव था।

दिन की झपकियों में स्वप्न की हर कौंध के साथ वह किसी पुरानी स्मृति में दाखिल होता था मगर उसी पुरानी घटना में उसे बिल्कुल नया अर्थ दिखाई देने लगता था। कभी कई बरस पहले रात को देखे गए कुछ सपने कौंध जाते। मगर वे ऐसे लगते जैसे बचपन की कोई भूली हुई बात अचानक याद आ जाती है। कई बार वह परेशान हो उठता था कि दरअसल उसे जो याद आया है वह उसके किसी ख्वाब का हिस्सा था या वास्तविकता का। यह सब कुछ इतने ही कम समय के लिए होता था जितने कम समय में आकाश में बिजली चमकती है। वह जब तक इन चीजों के मायने को समझ पाता वह तेजी से उसकी स्मृति से ओझल हो जाती। यह बिल्कुल ऐसे ही था जैसे कोई खड़िया से कुछ लिख रहा हो और वह मिटता भी जा रहा हो।

उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिंदगी सिर्फ उतनी भर नहीं है जितनी वह जागते हुए देखता-महसूस करता है, बल्कि नींद और सपनों की देहरी पर खड़े होकर देखो तो वह एक मुकम्मल आकार लेती है।

यह मेरे लिए महज एक संसार से दूसरे संसार में कदम रखने जैसा था। मगर इन दो कदमों के बीच का फासला रहस्य से भरा था। मैं कभी याद नहीं रख पाता था कि मैं किस पल स्वप्न के भीतर दाखिल हुआ। अक्सर होता था कि वास्तविक संसार में सुनाई देने वाले शब्द, ट्रैफिक और जेनरेटर का शोरगुल सब मेरे इर्दगिर्द तैरने लगते थे। आवाजें किसी जंगल, कुहरे अथवा अंधेरी गलियों मे भटकने लगती थीं।

उसने अपनी डायरी में लिखा।

हर बार नींद का झोंका मुझे कुछ भूली हुई बातों की याद भी दिला देता है। यह तत्काल में देखी गई तमाम छवियों में जीवन भर में इकट्ठा छवियों को शामिल कर देता है। उन छवियों से जीवन के प्रति एक नया अर्थ पैदा होता है। हर तात्कालिक छवि किसी पुरानी छवि के साथ घुलमिल जाने पर जीवन के साथ एक नए रिश्ते को खोलती हैजिसे मैं जाग्रत अवस्था में कभी नहीं समझ पाता।

एक दिन और उसने लिखा…

धुंध हमेशा अस्पष्टता नहीं लातीधुंधलापन कई बार जीवन के बड़े अर्थ या रहस्य की तरफ संकेत करता है। स्पष्टता भ्रम पैदा करती है। हर स्पष्ट वस्तु हमें विवश करती है कि हम उसे ठीक उसी तरह से समझें जैसी कि वह अपने भौतिक रूप में हैं। मगर क्या जीवन सिर्फ भौतिक वास्तविकताओं के जरिए समझा जा सकता है? इस दुनिया की हर वस्तु को हम अपने अनुभवों की ताप में महसूस करते हैं। हर भावना संगीत के एक नोटेशन की तरह है, स्वप्न इन्हें संगीत में बदलने की कोशिश करते हैं। यानी हर स्वप्न हमें पूर्णता की ओर उन्मुख करता है। यह भावनाओं की पूर्णता है। जाग्रत अवस्था तो सतही है। वहां हर भावना का एक क्षणिक जीवन है जो बाहरी भौतिक वातावरण से प्रभावित होता है। मगर स्वप्न हर भावनात्मक स्पार्क को सहेजता है और उसको एक वृहत्तर गाथा में बदलता है।” 

सपनों की दुनियां में आवाजाही उसके लिए एक दिलचस्प खेल में बदल गया था।

यह खेल कभी भी शुरु हो जाता था। अपने दफ्तर की चपल और तीक्ष्ण आंखों वाली लड़की को वह अक्सर चोरी-छुपे देखा करता था। चोरी-छुपे ही… क्योंकि उसे हमेशा लगता था कि वह उससे घृणा करती होगी, क्योंकि उसके पास आने पर वह हमेशा किसी न किसी बहाने से उसे नजरअंदाज करती थी।

एक दिन अपनी टेबल पर बैठे-बैठे उसने निगाह दौड़ाई तो पाया कि वह उसी की तरफ देख रही थी। वह उसे देखकर मुस्कुरा उठी। वह समझ गया कि उनींदेपन में उसे सपना आ रहा है। इससे पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ। उसके देखते-देखते वह अपनी मेज से उठी और उसके पास आने लगी। उसने मेज को थपथपाया, ताकि जागने और नींद के फर्क को महसूस कर सके। लड़की सचमुच उसके सामने खड़ी थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करे।

अब उसके सामने एक नया सवाल था। अगर सचमुच वास्तविकता और सपनों के बीच इतना झीना सा फर्क है तो क्या वास्तविकता को भी अपनी निजी रोशनी में देखा जा सकता है। क्या जिंदगी उसकी मनचाही कहानी में बदल सकती है। क्या इस जिंदगी में वह सपनों की तरह एक लंबी दौड़ लगा सकता है। इस दौड़ में सिर्फ जगहें पीछे न छूटें बल्कि परिवेश और काल भी उसके कदमों तले गुजरता जाए। जहां उसे कोई चोट न पहुंचा सके। गर चोट पहुंचाए तो दर्द न हो। वह जिंदगी को एक सख्त खुरदुरे पत्थर की तरह नहीं बल्कि भावना की एक तरंग की तरह महसूस कर सके। जहां जिंदगी के बारे में उसकी नाजुक सोच आहत न हो। बल्कि कल्पनाएं ही जिंदगी बन जाएं। जैसे वाटर कलर से बने सैरा।

वह अपने अतीत को पा सके। खोई हुई सुबह और शामों को पा सके। पिता के कदमों की आहट फिर-फिर सुन सके।

***

उसने अपनी बेमकसद जिंदगी का मतलब सपनों में तलाशना शुरू कर दिया। उसकी चेतना में दो दुनियाओं के बीच का फर्क मिट गया। स्वप्न कभी भी उसके वर्तमान में दाखिल हो जाते थे और वह अपने सपनों में कभी भी एक सचेत हस्तक्षेप कर सकता था।

वह धुआँधार बारिश का मौसम था। दीवार की दरार नन्हें प्राणियों से भर गई थी। साल-दर-साल वह और कमजोर होता जा रहा था। जब कभी आइने के सामने वह अपने कपड़े उतारता तो हड्डियों का ढांचा भर नजर आता। मां इस बीच ज्यादा बीमार और अपने में खोई रहने लगीं। मां उसके अस्तित्व से इस कदर अभिन्न हो गई थीं कि कई बार उनकी अनुपस्थिति का ख्याल ही उसके सामने एक भयावह शून्य खड़ा कर देता था।

…और एक दिन कुर्सी पर बैठे-बैठे नींद के झोंके मे उसे अपने पिता दिखाई दिए, जिन्हें वह लगभग भूल चुका था। ठीक वैसे और उतनी ही गरमाहट से भरे हुए जैसे कि बचपन में दिखते थे। वे किसी से जिरह कर रहे थे। एक विश्वास से भरी जिरह। उनके पास हमेशा की तरह नपे-तुले शब्द थे- जिनमें जीवन की समझ छिपी थी।

इस सपने में मुझे पिता का नया रूप दिखाई दिया। जिसे मैं बचपन में कभी समझ नहीं पाया था। शायद तब मैं बहुत छोटा था। अब मुझे एहसास हुआ कि वे दरअसल जिंदगी को इस तरह से समझते थे कि उनका होना और उनकी जिंदगी दोनों एक हो जाएं। जीने का अर्थ उनके शब्दों और कर्म में छिपा था। मेरे सपने में वे जिस नरमाहट भरी दृढ़ता के साथ अपनी कह रहे थेउसके पीछे उनकी अपनी आत्मा की आवाज थी।

उसकी नींद उस बात की तह तक न जा सकी। पिता की जिद क्या थी? वह कभी समझ नहीं पाएगा।

मगर यह सपना उसे एक बिल्कुल नई वास्तविकता के करीब ले गया। उसे इस बात का एहसास हुआ कि कैसे कोई ‘न होने के बावजूद’ अपने अस्तित्व के एहसास को बनाए रख सकता है। वह उसी तरह से हमारे आसपास मौजूद रहेगा जैसे अषाढ़ के काले घुमड़ते बादलों में पानी मौजूद होता है। वैसे ही पिता थे। उसके स्वप्नों में विचरते। उसके आसपास। शरीर से नहीं। शब्दों से नहीं। आवाज से नहीं। अपनी गति से। अपने कर्म से। उनके कर्म ब्रह्मांड में दर्ज थे। घटनाओं के गणितीय संयोग में अतीत की फुसफुसाहट फिर सुनाई देती है। काल के अंतराल मिट जाते हैं। तारीखों से पर्दे उठ जाते हैं और पुरानी घटनाएं वर्तमान के मंच पर चहलकदमी करने लगती हैं। समय के बंधन से परे। वह कभी भी उनसे मिल सकता है।

और एक दिन वह अपनी कुर्सी से उठा और अगले ही कदम में पांच जनवरी 1978 की कुहरे से भरी सर्दियों में दाखिल हो गया। बाहर धुंध इकट्ठा होने लगी थी। सड़क पर कहीं रेडियो से फिल्मी धुन उठ रही थी। चालीस वाट के बल्ब की पीली मटमैली रोशनी में मां किचन में स्टोव को पंप करती नजर आतीं। तख्ते पर पड़े अखबार के पन्नों पर सिनेमा के बड़े-बड़े इश्तहार छपे थे। दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने आंगन पार करके सांकल खोली तो पिता नजर आए। आप कहां थे? आप तो अपने आफिस में हैं और ही अब मेरे घर पर नजर आते हैं। आखिर कहां छिपेछिपे घूमते रहते हैं आप? मैं बड़ा हो चुका हूं। कितनी सारी बातें आपसे बताने के लिए हैं…”

वह आवेश में आकर उनसे जिरह करता है। आखिर बचपन से ही सोचता आया है कि बड़े होने पर पिता मिलेंगे तो ऐसे ही बात करूंगा।

पिता उसे ग़ौर से सुनते हैं मगर उससे बात नहीं करते हैं। पिता कभी भी उससे सपनों में बात नहीं करते। तब उसे बड़ी शिद्दत से यह अहसास हुआ कि सपने में दाखिल होने के बाद भी वह एक आउटसाइडर है। सपनों की दुनिया से उसका कभी सीधा रिश्ता नहीं बन सकेगा। वह सपने में दाखिल तो हो सकता है मगर कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। बस एक दर्शक की तरह देख सकता है। वह चीखेगा मगर उसकी चीख उन्हें कुहरे की तरह चीरते हुए कहीं गुम हो जाएगी। “मैं और पिता अंतरिक्ष में छिटके सितारों की तरह थे। एकदूसरे को देख सकते थे मगर काल की गणना ने हमें हजारों प्रकाशवर्ष दूर फेंक दिया था।

***

मां के कमरे में लटके कैलेंडर की तारीख कई दिनों से नहीं बदली है। खिड़कियों से आ रही तेज हवा से उसके पन्ने फड़फड़ा रहे थे। वह बीते कई दिनों से दफ्तर नहीं गया। मां एक हफ्ते से बुखार में है और वह अपने बंद कमरे के चम्पई अंधेरे में लगातार अपने अतीत से लड़ रहा है। कमरे की छत पर रोशनी से बनती-बिगड़ती छवियों को वह गौर से देखता रहता है।

सुबह होने वाली मगर बीते कई घंटों से छत पर रुक-रुककर कोई आहट हो रही है। शायद रात से मुंडेर पर बाघ टहल रहा है। वह खिड़की से झांकता है तो पाता है कि बाहर आंगन में पिता खड़े हैं। कुछ पलों बाद वे चुपचाप आंगन में बैठ जाते हैं और दीवार के पास रखी खुरपी उठाकर आंगन में बनी क्यारी की गुड़ाई शुरू कर देते हैं। वह खामोशी से अपने पिता को देखता रहता है। थोड़ी देर बाद भीतर मां के कमरे में जाता है। उनके बदन से आंच उठ रही है। उनकी आंखें बंद हैं और सांस तेजी से चल रही है। जब वे सांस छोड़ती हैं तो उनके गले से थीमी सी गुर्राहट सी निकलती है।

वह मां के सिरहाने बैठ गया। उसने मां का हाथ थामा। उनका हाथ बहुत हल्का लग रहा था। किसी सूखी हुई टहनी की तरह। सफेदी लिए गोरी रंगत पर ढेर सारी नसें उभरी हुई थीं। बाहर सुबह की बयार में कोई परिंदा चहचहा रहा था। मां ने खाली कमरे में बुखार में आंखें बंद किए-किए कुछ बुदबुदाया…। उनकी बंद आंखों के भीतर समय बीस साल पहले की तरफ घूम चुका था। जुलाई की वह सुबह रोज के मुकाबले कुछ ज्यादा अंधेरी थी। आसमान में फैले बादल उसकी मां के स्तनों की तरह भारी और डबडबाए हुए थे। मां ने अस्पताल के सुरमई उजाले में उसे पहली बार देखा था। उसकी काली आंखों और हाथ-पैर की पारदर्शी उंगलियों को। सीधे उनके गर्भ से बाहर आया एक धड़कता हुआ अलहदा अस्तित्व।

बाहर का दरवाजा खुला था। हवा के झोंके से कमरे के पर्दे हल्के-हल्के हिल रहे थे। भीतर घर में कहीं पानी टपकने की आवाज़ आ रही थी। उसने अपनी आंखें बंद कीं और पानी गिरने की आवाज को चुपचाप सुनता रहा। बंद पलकों के पीछे अंधेरे में दिन भर की जाने कितनी बातें बवंडर की तरह चक्कर खाती रहीं… और तब उसने मां को देखा। जैसे वे उसके बचपन में दिखती थीं। जवान, खूबसूरत और इत्मिनान से भरी। किसी शांत दोपहर में कच्ची दीवालों वाले घर की खिड़की से बाहर ताकती। उनके हाथों में एक डायरी थी, जिस पर वे किताबों में पसंद आ जाने वाली कविताएँ या शायरी बड़े धैर्य से बैठकर लिखती रहती थीं। वह उनके करीब गया। बाहर की बयार से पेड़ सरसरा रहे थे और मां के चेहरे पर ढलक आई लटें हल्के-हल्के हिल रही थीं। वे अपनी डायरी पर झुकी हुई थीं। उनके चेहरे पर एक उजाला ठहरा हुआ था। वह एक एकाग्र और अपने में तल्लीन चेहरा था। मां की यह छवि उनकी बाद की तमाम छवियों के भीतर कहीं खो गई।

मन के भीतर एक के बाद एक दरवाजे खुलते चले जाते हैं। यही मां की वो छवि थी जिसको उसने असल जिंदगी में खो दिया था। मां खुद इस छवि को खो चुकी थीं। इसके बाद सपनों की एक अनवरत दौड़ थी उस खोई छवि को पाने की।

उसकी आंखें खुल जाती हैं। मां बार-बार अपनी जुबान होठों पर फेर रही हैं। उनको पानी चाहिए। वह उनके पास से उठकर मेज के पास तक जाता है। तुम हर दूसरे पल बदल जाते हो। समय तुम्हारे भीतर से होकर बह रहा है। मगर उस धारा में कुछ ऐसा है जो बदलता नहीं और स्वप्न की मृगमरीचिका बन जाता है। तुम उसे हासिल करने के लिए अपने अवचेतन में दौड़ते रहते होमगर वह कभी हाथ नहीं लगता…”

वह मां के करीब आता है। उनकी पीठ पर अपनी बांह का सहारा देकर पानी का गिलास उनके होठों से लगा देता है। मां अपना गला थोड़ा सा तर करती हैं, फिर तकिए पर टेक लगा लेती हैं। वह उसकी तरफ इस तरह से देखती हैं जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों। ऐसा अक्सर उस वक्त होता है जब शरीर की तकलीफ उनकी बर्दाश्त करने की हद को पार करने लगती। “चिंता मत करिए आप ठीक हो जाएंगी…” उसने आहिस्ता से कहा।

“…फिर हम उस शहर चलेंगे जो दसो दिशाओं में फैला है। पेड़ की शाखाओं की तरह आसमान तक फैली उसकी सड़कें और मकान जगमगा रहे हैं। उसी शहर के किसी अनजान कोने में वह लड़की भी होगीजो घनघोर बारिश के बीच किसी मकान के बरामदे में भीगतीठिठुरती मिली थी। शायद वहां आपको पिता भी मिल जाएंहो सकता है वे हमसे कभी न मिलें और शहर की अंधेरी गलियों में हमसे छिपते फिरें। वहां मैं आपसे एक बार फिर मिलुंगा। उस मां से जिसे मैं नहीं जानता। जो लकड़ी की संदूकची में बंद अपनी पुरानी चिट्ठियों जैसी रहस्य से भरी है।

वहां मैं खुद से भी मिलुंगा। किसी छत पर खड़ा दूर छितिज में उड़ती धूल को कौतुक से देखता…”

 

समाप्त

विज्ञापन वाली लड़की

बीते एक हफ्ते से लगातार पानी बरस रहा था। आसमान में सुरमई बादल भाप की तरह उड़ते थे और पूरा शहर हवा के झोकों पर तैरती फुहारों से भीगता रहता था। भारी-भरकम पेड़ों के नीचे एक अलग किस्म की टिप-टिप होती थी। पत्तियां भीगकर भारी हो जातीं और फुनगियों से नीचे तक अटक-अटककर गिरता पानी मद्धिम सा कोलाहल पैदा करता। शाम को अचानक घना अंधेरा छा जाता था। उघर की दिशा से काली पेंसिल और खडिय़ा से रंगे बादल उमडऩे लगते और आभासी उजाले में भागती गाडिय़ों की हेडलाइट में आसमान से गिरती बूंदें चमकने लगती थीं। हर गीली चीज रोशनी पड़ते ही चमक उठती थी। बूंदा-बांदी थोड़ी देर को रुकती तो थमी हुई हवाएं जाने कहां से बदहवास चल पड़तीं, लोगों के गीले कपड़े फडफ़ड़ाने लगते और खिड़कियों से हवा के रगड़-खाने की आवाज सुनाई देती।

इस तूफानी मौसम में उसे करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर शाम को दफ्तर पहुंचना होता था। घर से कुछ दूर चलने के बाद एक पुराना पुल पड़ता था। जिसकी पानी टपकाती ईंटों पर काई और घास-फूस छाई हुई थी। थोड़ी बारिश में ही पुल के नीचे की सड़क टखनों तक गंदले पानी से भर जाती थी। ऊपर से पानी बूंद-बूंद लगातार टपकता रहता था। ऊपर से कोई ट्रेन गुजरती तो पुल की ढलान वाली छत पर चिपकी असंख्य बूंदों में हलचल मच जाती। कोयले की आंच के समीप दुबके और बात-बात पर गुर्राते आवारा कुत्तों, दिन भर की दिहाड़ी के बाद गोल घेरा बनाकर बैठे मजदूरों, चाय की प्याली से उठती भाप, टीन के ढाल पर बहते पानी के रेले और सजी मंडी की कीच भरी गलियों को पार करता वह कुछ ही देर में हाइवे पर निकल जाता था।

इस हाइवे पर आकर वह करीब एक किलोमीटर की बचत कर लेता था। लिखा-पढ़ी में इस हाइवे को ‘एनएच 24’ के नाम से जाना जाता है। यहां आसपास नयी जिंदगी बस रही थी। गाडिय़ां बेतहाशा भागती थीं। इस इलाके में हजारों मजदूर ईंट ढोते और गारा तैयार करते नजर आते। सड़क से बहुत हटकर बलखाती नाले जैसी नदी के पास उनकी बस्तियां थीं। मटमैले और पैबंद लगे कपड़ों में इन मजदूरों के बीच भागते-गरजते वाहनों के बिल्कुल पास बेपरवाह होकर खेलते थे। शहर बदल रहा था। देखते-देखते वह चौड़ी, उदास और अकेली सड़क स्ट्रीट लाइट से जगमगाने लगी। गीली सड़क पर उनकी रोशनी दूर तक चमकती दिखाई देती। इस शहर की हलचल दरअसल उस वीराट धक-धक का एक हिस्सा थी, जो वहां सिर्फ दो सौ किलोमीटर पर हो रही थी। यह दुनिया के एक बहुत बड़े महानगर के सीमांत पर बसा कसबेनुमा शहर था, जिसकी तलछटों में कालिख, धुएं और शोर में डूबे इलाके थे। सुदूर ब्रह्मांड में अगर कोई शक्तिशाली दुरबीन से आंख टिकाकर उस शहर को देखता तो वह धड़कते दिल की तरह फैलता और सिकुड़ता दिखाई देता और सड़कों पर रेंगती गाडिय़ां नसों में टहलते रक्त की तरह नजर आतीं।

तेजी बदलता यह शहर उसके अपने घर से करीब एक हजार किलोमीटर दूर था, वह अपनी बीमार मां से एक हजार किलोमीटर दूर था, अपनी उदासी में डूबी किशोरावस्था और घुटन से भरे नौजवानी के दिनों की स्मृतियों से भी एक हजार किलोमीटर दूर था। वह हर बात से इस कदर दूर था कि लगभग चुप था। उसे बोलते बहुत कम लोगों ने देखा होगा। जिस अखबार के दफ्तर में वह काम करता था, वह शहर के बाहरी हिस्से में बसे इंडस्ट्रीयल एरिया में बना था। काम करने वालों के आने और जाने का बाकायदा रजिस्टर में टाइम नोट होता था। वर्दी पहने गार्डों और बरसाती से ढके कागज के भारी-भरकम रोल के बीच से गुजरता हुआ वह गोदाम जैसे बड़े हाल की सीढिय़ां चढ़ता था, जिसके कोने पान की पीक से कत्‍थई रहते थे। ऊपर बोर्ड के लंबे-चौड़े पार्टीशन से बने कमरों में लाइन से कंप्यूटर लगे थे, इनके की-बोर्ड और स्क्रीन मटमैले हो चुके थे और पीछे लगे तार महीनों पुरानी धूल से अटे रहते थे। वह अपनी सीट पर जाते ही खाकी लिफाफों को फाड़ता, तह लगाये कागजों को स्टैंड पर लगाता और काली-नीली रोशनाई पर आंखें टिका देता। ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में दर्जन भर की-बोर्ड खडख़ड़ाते रहते। आधी रात बीत जाने के बाद उसका काम खत्म होता था। अक्सर पैदल ही दूसरे रास्ते से घर की तरफ चल देता था। कभी-कभार कोई साथी अपनी दुपहिया पर बैठाकर हाईवे के मोड़ तक उसे छोड़ देता था।

यह मानसून के शुरुआती दिन थे। कहते हैं कि इस साल बरसात अच्छी हुई। सचमुच। बारिश की बूंदें आपस में टकराकर बहुत महीन फुहार का रूप धर लेतीं, जो तेज हवा में भाप की तरह तैरती दिखाई देती। ऐसी ही एक शाम जब आसमान में बादल बहुत निचाई पर धुएं की तरह तैर रहे थे और हवाओं का मिजाज तूफानी था, उसने पेड़ के नीचे ठिठुरते हुए वह विशालकाय होर्डिंग देखा। वह अवाक रह गया। इतना बड़ा होर्डिंग इससे पहले शहर में कभी नहीं लगा था। वहां हाइवे एक दूसरी सड़क से जाकर मिलता था। उधर से दौड़ती गाडिय़ों की हेडलाइट होर्डिंग पर रोशनी के सैकड़ों प्रतिबिंब बना रहे थे। उस विशालकाय विज्ञापन में कुछ ऐसा था कि वह खुद को बिल्कुल बौना महसूस करने लगा। वह एक मोबाइल कंपनी का बेहद लंबा होर्डिंग था। उसका अधिकांश हिस्सा खाली था। बायीं तरफ एक लड़की खास भंगिमा में खड़ी मुस्कुराती हुई सामने की तरफ देख रही थी। अनुपात के नजरिये से इतने बड़े होर्डिंग के एक कोने में खड़ी उस लड़की का कद सचमुच की किसी युवती जितना था। वह हैरान रह गया। वह दरअसल मुस्कुराती हुई उसी की तरफ देख रही थी।

उस दिन उसे हल्का सा बुखार भी था। पीठ में रह-रहकर दर्द की लहर सी उठ रही थी, मगर अपने संदेह को झुठलाने के लिए उसने सावधानी से सड़क पार की। पेट्रोमेक्स की लपलपाती सफेद रोशनी में भुने चने खरीदे और पलटकर होर्डिंग की तरफ देखा। लड़की अभी भी उसी की तरफ अपलक देख रही थी। वह तिराहे पर छितराई भीड़, आटो-रिक्शा और तांगे वालों के बीच देहात के लिए भागते-हकबकाए लोगों के बीच यहां-तहां भटकता रहा। और उसे पक्का यकीन हो गया। निगाहें उसका पीछा कर रही थीं। अब उस लड़की के देखने में ज्‍यादा बेबाकी थी। उसकी पूरी मौजूदगी में एक तपिश थी। एक मद्धिम आंच – जो उसकी आंखों के पीछे आहिस्ता-आहिस्ता सुलग रही थी। बलखाए बालों के बीच गाल दहक रहे थे। उस मुस्कुराहट में भी एक ताप था। एक ऐसी सुंदरता थी जो आग में होती है – निषिद्ध, खतरनाक और गरमाहट से भरी सुंदरता – जंगल में जलने वाली आग की तरह रहस्यमय। देर तक देखने पर मानो आग फैलने लगती थी, होर्डिंग जलने लगता था और उसके पिलर्स धधक कर लाल हो उठते थे। उस रात उन निगाहों ने बहुत देर तक उसका पीछा किया…

क्या यह नियति का कोई अजीबो-गरीब खेल था? वह कई रात उस विज्ञापन वाली लड़की के बारे में सोचता रहा। यह एक ऐसा सच था जो सिर्फ वही जानता था। हर बार जब उधर से गुजरता था तो विज्ञापन वाली लड़की उसकी तरफ ही देख रही होती थी। वह चोर निगाहों से अपने आसपास देखता। सभी अपने काम में मशगूल होते थे और वह उसे देखती रहती थी – बिना किसी हिचक या लाग-लपेट के। तो क्या बचपन से वह जो ख्वाब देख रहा था सही साबित हुआ। आखिर इस तकलीफ से भरी जिंदगी से परे कोई तो दुनिया है। जहां लोग सचमुच उसी तरह से खुश हैं, जिस तरह से उन्‍हें होना चाहिए – एक आदर्श जिंदगी।

विज्ञापन वाली लड़की बहुत कम दिनों में उसके सपनों में दाखिल हो गयी थी। बचपन से देखे उन सपनों के भीतर हजारों ख्वाहिशें थीं। इन ख्वाहिशों ने लंबी तपती दुपहरियों में ऊंधते कसबे के उन उकताहट से भरे दिनों जन्‍म लिया था, तब वह तेरह साल का था। कसबे में आये सिर्फ दो साल बीते थे। पिता को गुजरे भी दो ही साल बीते थे। वे एक सरकारी महकमे में बाबू थे। मां उसे लेकर सालों से बंद उस पुश्तैनी मकान में लौट आयीं, जिसकी छत पर लकड़ी की दीमक खाई कड़‍ियां लगी थीं। पड़ोस की आरा मशीन से लकड़ी चिराई के बाद बचने वाला महीन बुरादा आता था। मां उसी को अंगीठी में भरकर खाना पकाती थी। सीढिय़ों के नीचे पड़े बुरादे के ढेर से ताजा चिरी लकड़ी की खुशबू आती रहती थी। उसकी मां अनपढ़, कम बोलने वाली और बदहवास सी औरत थी। पेंशन लेने कचहरी जाती तो हर बार अंगूठा गलत जगह लगा देती और कभी बाबू तो कभी चपरासी की फटकार सुनती। रुपये लेते ही उसे थमा देती और वे उसे गिनते हुए बाहर वकीलों और मुवक्किलों से भरे गलियारे से गुजरते थे।

‘मां अब बहुत दूर है – हजार किलोमीटर दूर!’ उसने भोर के चार बजे अपनी कमर सीधी करते हुए मन ही मन सोचा। घंटे-दो घंटे को थमी बारिश अचानक तेज हो उठी और टीन की छत बजने लगी थी। रात तीन बजे जब काम खक्म करते सीढिय़ां उतरता तो अखबार छापने वाली मशीन के शोर से कुछ भी सुनाई नहीं देता था। इन दिनों वह हमेशा हाइवे से होते हुए ही घर वापस आता था। जहां विज्ञापन वाली लड़की उसके इंतजार में खड़ी मिलती थी। बिल्कुल वैसे ही जैसे पिछली रात वह छोड़ गया था। बस उसकी निगाहों का तीखापन दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में की-बोर्ड की अंतहीन खड़खड़ाहट के बीच उसके सहकर्मियों ने उन दिनों शायद उसमें आये बदलावों पर गौर नहीं किया। उस पूरे हॉल में एक खटखट अचानक रुक जाती थी। वह देर तक एमएस डॉस प्रोग्राम की काली स्क्रीन पर उभरे सफेद देवनागरी के अएक्षरों को घूरता रहता था और कभी-कभी मुस्कुरा उठता। और शायद हाइवे से एक मिनट के भीतर गुजरने वाले सैकड़ों लोगों में से कोई यह नहीं भांप पाता था कि घनघोर बरसात में भीगते होर्डिंग पर टिकी उस युवती की मुस्कान भी गहरी हो जाती।
विज्ञापन वाली लड़की की उस मुस्कुराहट को, उसकी निगाहों के ताप को वही पहचान सकता था। जिस पुश्तैनी घर में वह अपनी मां के साथ रहता था, वहां की नक्काशीदार पल्लों वाली एक अलमारी पुरानी पत्रिकाओं से भरी पड़ी थी। सन 1958 से लेकर 1974 तक की पत्रिकाएं – जिनके कागज पीले पड़ चुके थे और हर पत्रिका में कागज से एक अलग किस्म की खुशबू उठती थी। यह पिता से उम्र में बहुत बड़े उसके ताऊजी का संग्रह था।

घर लौटने के बाद वह अक्सर उन पत्रिकाओं की धूल झाड़ता और उन्‍हें लेकर बैठ जाता था। उसे उन किताबों में छपे विज्ञापन सबसे ज्‍यादा दिलचस्प लगते थे। हर बार जब वह उन पत्रिकाओं को खोलता तो एक अनोखा संसार सामने खुलने लगता। जिनमें मुस्कुराते हुए स्वस्थ नन्हें बच्चे थे। थोड़े बड़े बच्चों में हमेशा एक भाई और एक बहन दिखाई देते। बहन फूलों की छाप वाला फ्राक पहने रहती और उसकी हमेशा दो चुटिया बनती थी। इन बच्चों के साथ हमेशा उनके माता-पिता होते थे। बुजुर्ग दादा या नाना हमेशा कुर्सी पर अखबार पढ़ते दिखते और खुशमिजाज बूढ़ी औरतें सिलाई करती या स्वेटर बीनती नजर आती थीं। इन पुरानी पत्रिकाओं में भी फिल्मी अभिनेत्रियां एक खास साबुन को अपनी सुंदरता का राज बताती थीं। उनकी क्लैक एंड व्हाइट तस्वीर छपी होती थी। सन बासठ के बाद की बच्चों पत्रिकाओं में चीन को ललकारने वाली बाल कविताओं के अलावा अक्सर टाफियों के विज्ञापन होते थे। टाफियों के चौकौर और गोल टीन के डिक्बों पर ब्रिटिश स्टाइल के हेयर कट और फ्राक वाली युवतियां होती थीं, या फिर टॉमस हार्डी के उपन्‍यासों से निकली कोई क्वालिन। वह पूरा-पूरा दिन इन विज्ञापनों में डूबा रहता था।

बचपन से ही उसे अक्सर बुखार आता था। बुखार से समय वे तसवीरें रात को सोते वक्त तक उसके हवास पर छायी रहती थीं। रात को जब उसकी मां सोने से पहले अपने पलंग का सिरहाना पकड़कर देर तक कुछ बुदबुदाती रहती, वह बगल में लेटे-लेटे इन्‍हीं विज्ञापनों की मदद से छत की कड़‍ियों पर नयी तसवीरें बनाता-बिगाड़ता रहता था। वह खुद को बड़ा होने पर अक्सर प्रिंटेड शर्ट और बेलबॉटम पहने मोटरसाइकिल चलाते एक युवक के रूप में देखता था, जिसे उसने शूटिंग-शर्टिंग के एक विज्ञापन में देखा था। वह मां को हमेशा घर में बने मंदिर के पास आरती की थाल लिये देखता था। वह मुस्कुराते हुए उसे आशीर्वाद देती थी – वह शायद घी के किसी विज्ञापन से निकली थी।
वहीं पड़ोस के घर से मांगकर लायी नयी-ताजी पत्रिकाएं उसके सपनों में नये रंग भर रही थीं। उनमें कभी-कभार चिकने रंगीन पन्नों पर तौलिया लपेटे वह युवती दिखाई दे जाती – जिसकी जांघों का बड़ा हिस्सा खुला होता था या फिर गीजर के विज्ञापन में दरवाजे के पीछे से झांकती मॉडल, जिसके कंधों से लेकर कमर के नीचे तक का आधा हिस्सा बिल्कुल नग्न दिखाई देता। इन तसवीरों को वह देर तक देखता था – एक अव्यक्त सी सनसनी के साथ – उसका गला सूख जाता था। कई बरस पहले जब वह पिता के साथ बिहार की धरती पर भागती ट्रेन में सफर कर रहा था, तो ऊपरी बर्थ पर अकेले लेटे-लेटे किसी फिल्मी पत्रिका को पलटते सहसा पूरे पन्ने पर छपी बिकनी पहने स्त्री को देखकर अवाक रह गया था। बढ़ी धड़कनों के साथ उसे देर तक देखता रहा। उस दिन भी वैसे ही गला सूखा उठा था। पहली बार उसे महसूस हुआ कि औरत के शरीर में कितने घुमाव और कितने उतार-चढ़ाव हो सकते हैं।

बरस बीतते गये। बदलते विज्ञापनों के साथ उसके सपने भी बदलते गये। अब इन विज्ञापनों में हीरो साइकिल पर सवार उमंगों से भरे युवक-युवतियों के बीच प्रेम की तितलियां नहीं फडफ़ड़ाती थीं। उनकी जगह कसरती शरीर वाले जीन्‍स पहने उन नौजवानों ने ले ली थी, जो रोमांचकारी यात्राओं के शौकीन थे। उनके पास बाइक और स्पोर्ट-शू थे। उनके कमरे में गिटार लटकता रहता और टेबल पर बाइनाक्यूलर, कंपास और रोड मैप फैला दिखाई देता। विज्ञापन की दुनिया में युवतियां अब शालीन स्वभाव और करीने से पहने कपड़ों को पसंद करने की बजाय गठीले बदन और मर्दाने अंदाज पर फिदा होती थीं। उम्र बढने के साथ-साथ उसकी काठी, चेहरा-मोहरा और समूची शख्सियत विज्ञापनों के संसार से निराशाजनक हद तक भिन्न थी। वह दुबले-पतले शरीर और धंसी आंखों वाले आत्मविश्वास से विहीन युवक के रूप में बड़ा हो रहा था। उसके आसपास की दुनिया और भी विद्रूप होती जा रही थी। मां बूढ़ी हो चुकी थी और उसकी बदहवासी अब खुद में डूबी एक बेपरवाही में बदल गयी थी। घर के भीतर जाने कहां से मटमैले मोटे चूहों की गिनती बढ़ती जा रही थी। उन्‍होंने गाहे-बगाहे नक्काशीदार अलमारी में घुसकर पत्रिकाओं को कुतरता भी शुरू कर दिया था।

लंबी बेरोजगारी, ट्राइका की गोलियों और मां की उदासी के बाद नौकरी करने वह अपना घर छोड़कर यहां कैंसर की तरह फैलते महानगर से कुछ सौ किलोमीटर के फासले पर चला आया। यह नौकरी उसके मामा ने लगवायी थी। यहां वह पत्रिकाएं नहीं देख पाता था, मगर विज्ञापनों की दुनियां अब कागजों में कैद नहीं रह गयी थी। दूधिया रोशनी में नहाये विशाल होर्डिंग तेजी से उस शहर में फैल रहे थे। कभी-कभी वह किसी नये होर्डिंग को देखता तो बहुत देर तक उसकी ओर टकटकी लगाये रहता। टेलीविजन पर भी उसे हमेशा विज्ञापन ही भाये। कोल्ड ड्रिंक पीते बिंदास नौजवान हों या घड़ी के विज्ञापन में टेनिस खेलते, टाई की गांठ बांधते हाथ या फिर साबुन, खुशबूदार मसाले या कंडोम के बहाने चुहल करते नवदंपति, वह सभी को पूरी दिलचस्पी से देखता था। दीवारों पर पेंट के विज्ञापन में जब दरवाजे खुलते थे और पूरे घर में दौड़ते बच्चों के साथ कैमरा आगे बढ़ता था, तो उसके पूरे शरीर में सिहरन सी हो उठती थी। बचपन से विज्ञापनों में देखी गयी सुखी और खुशहाल इंसानों की तमाम छवियां नास्टेल्जिया बनकर उमड़ पड़तीं। लगता अतीत में कोई राज छिपा है, जो खो गया है और अब कभी नहीं मिलेगा। उसे उसी दूसरी दुनिया की तलाश थी। वही सच था। उस संसार में एक अनुशासन था, कोई बुरा नहीं था, सभी एक-दूसरे की इज्‍जत करते थे, सभी खुश थे, सभी जिंदगी को जीने में यकीन रखते थे, सभी वर्तमान में जीते थे। सोचते-सोचते उसका दिल उदास हो उठता था। विज्ञापन उसे हमेशा उदास कर देते और आहिस्ता-आहिस्ता मां चेहरे की झुर्रियां उभरने लगतीं।

दो दिन की चकमक धूप और चिपचिपाती उमस के बाद उस रात फिर न जाने कहां से दुनिया-जहान के बादल उस बेतरतीब से शहर के आसमान पर इकट्ठा होने लगे। रात डेढ़ बजे ग्रिड फेल हो गयी और पूरा शहर अंधकार में डूब गया। आसमान में बिजली लगातार कंपकंपा रही थी मगर कोई गर्जना नहीं थी। हवा बिल्कुल चुप थी। वह गलियों से होता हाइवे की तरफ निकल आया। आज होर्डिंग अंधेरे में डूबा हुआ था। करीब डेढ़ मिनट पैदल चलने के बाद बाद अचानक आधा आसमान भक से सफेद हो उठा। बिजली की इस कौंध में उसने जो देखा, तो उसे खुद पर यकीन नहीं हुआ…

विज्ञापन वाली लड़की होर्डिंग में नहीं थी।

हां, उसके बाद बिजली लगातार कौंधी थी और गाडिय़ों की हेडलाइट भी पड़ी। लड़की वहां कहीं भी दिखाई नहीं दी। घर आते-आते हवा और भारी हो गयी। वह कहां चली गयी? वह बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचता रहा। नहीं! वह चौंककर उठ बैठा। यह बात इस पूरे शहर में सिर्फ वही जानता है, वह लड़की सिर्फ उसे ही तो देखती थी। नहीं! तस्वीरें बेजान नहीं होतीं। चार साल की उम्र में कैलेंडर में जब वह चटख लाल रंग की निकर पहने एक खास कंपनी के बिस्कुट खाते बच्चों को देखता तो सोचता था कि इन्हें अगर कैंची से काट लिया जाए तो ये बच्चे कैलेंडर से आजाद हो जाएंगे और हंसते-बोलते उसके घर में घूमने लगेंगे। वह लड़की भी आजाद हो गयी है। वह इसी शहर में कहीं है। हंसती-बोलती नहीं, बदहवास और बुरी तरह घबरायी हुई। यह बात कोई और नहीं जानता है। लड़की को उसे ही तलाशना होगा।

वह तीर की तरह उस अंधेरी रात में निकल पड़ा। गलियों में भौंकते आवारा कुत्तों और डीजल सने कीचड़ में धंसे ट्रकों के बीच मंडराते हिजड़ों से बचता वह मंडी की तरफ भागा जा रहा था। मंडी की संकरी गलियां हाइवे से जाकर जुड़ती थीं। वह उन तंग गलियों में बदहवास भागता जा रहा था। सब कुछ पीछे छूटता जा रहा था। तौलिया लपेटे युवती, बुरादे की महक, मां का झुर्रियों वाला चेहरा, की-बोर्ड की खटखट, कॉलेज कैंपस में बुलबुले छोड़ती कोल्ड ड्रिंक – सब पीछे छूटता जा रहा था। वह पूरे जीवन जो सोचता रहा वह गलत नहीं था। उस ‘दूसरी दुनिया’ का अस्तित्व है। वह लड़की सचमुच है और इसी शहर में कहीं गायब हो गयी है। आखिरकार भारी हवा भी बूंदों का बोझ देर तक बरदाश्त नहीं कर सकी और बूंदें बे-आवाज उस अंधेरे में डूबे शहर पर गिरने लगीं। एक गली से दूसरी गली छानते हुए आखिर वह मिल गयी। बारिश में तरबतर। दुकानों के शटर के बीच खाली हिस्से में दुबकी हुई। बारिश में भीगकर उसका ताप खक्म हो चुका था। वह रात के अंधेरे में राख की तरह उदास और सुरमई लग रही थी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इस तरह देखा जैसे हमेशा से एक-दूसरे को जानते हों। उनकी आंखों-नाक से पानी के परनाले बह रहे थे।

अब वह तौलिये से अपने बाल सुखा रही थी। सवा महीने से होर्डिंग में अटकी लड़की आज उसके घर थी। कौन यकीन करेगा कि कंपनी ने जिस पर लाखों-करोड़ों खर्च किए वह लड़की आजाद होकर उसकी छोटी सी बरसाती में बैठी है। उसने लड़की को गरम चाय पिलायी और नारियल वाले बिस्कुट खाने को दिए, जिसे उसने चुपचाप बच्चों की तरह खा लिया। सुबह होने वाली थी। वह सूखे कपड़ों और चादर की गरमाई में दुबककर सो गयी। सुबह 10-11 बजे आंख खुली तो देखा कि विज्ञापन वाली लड़की ने किसी भी आम हिंदुस्तानी स्त्री की तरह उसके कमरे में बिखरे सामान को काफी करीने से लगा दिया था। खुद चुपचाप कोने में बैठी अपने नाखूनों को कुरेद रही थी। वह उस लड़की से बात नहीं करना चाहता था। उसे भय था कि कहीं बात करते ही यह पारभासी हकीकत छिन्न-भिन्न न हो जाए। इसलिए वह जल्दी से जल्दी दिन की रोशनी में उस होर्डिंग को दोबारा देखना चाहता था।

दोपहर डेढ़ बजे ही वह हाइवे पहुंच गया। होर्डिंग रात की तरह खाली था। वहां कोई लड़की नहीं थी। होती भी कैसे – उसने तो बीती रात उसी के कमरे में बिस्कुट के साथ चाय सुड़की थी। हैरानी की बात थी कि सड़क से गुजरते सैकड़ों लोगों में से किसी का क्यान उस होर्डिंग की तरफ नहीं गया। उनकी छोड़ें तो तिराहे पर खोमचे, गुमटी और ठेले वालों ने भी क्या इस बात पर ध्यान नहीं दिया? उस रात वह अखबार के दफ्तर कंपोजिंग करने नहीं पहुंचा। बहाना गढ़ दिया कि तबियत खराब है। उसे संदेह हो रहा था कि कहीं यह बात खुल न जाए। घर लौटते वक्त पूरे रास्ते जहां-तहां उसे यही शक होता रहा कि कुछ लोग उसके मन में छिपी बात को ताडऩे की कोशिश कर रहे हैं।

वैसे मन की बातें ताडने का भय तो जैसे बचपन से ही उसका पीछा करता रहा। पिता की मौत के बाद उदासी से भरे बचपन के दिनों में वह हमेशा एक ही बात सोचता रहता था कि कैसे भी स्लेट पर लिखी चाक जैसी उसकी जिंदगी को कोई पोंछ दे और अचानक एक नयी जिंदगी शुरू हो जाए। जीवन में किसी भी तरह के बदलाव को लेकर उसकी उम्मीदें इस कदर खत्म हो गयी थीं कि वह हमेशा किसी चमत्कार की उम्मीद करता था। उसे यह भी लगता था कि वह इस दुनिया में औरों से खास है और उसके साथ कभी न कभी कोई चमत्कार जरूर घटित होगा। नक्काशीदार अलमारी में रखी किताबें उसे हमेशा एक सपनीली दुनिया में ले जाती थीं। उसे हमेशा वही विज्ञापन भाते थे जो खास तरह की जिंदगी जीने को आमंत्रित करते थे। किशोरावस्था के दिनों में ‘कंप्लीट मैन’ की परिभाषा बताने वाली एक शूटिंग-शर्टिंग कंपनी का विज्ञापन उसे बेहद पसंद था। उनमें हंसमुख, उदार, बच्चों और जानवरों के साथ खेलने वाले, एकांतप्रिय और प्रतिभावान पुरुष होते थे। वे स्त्रियों से प्रेम करते थे मगर अपनी बनायी दुनिया से कभी बाहर नहीं निकलते थे। वह उनके जैसा ही बनना चाहता था।

बाद के सालों में जवानी में कदम रखने के साथ टेलीविजन पर वाशिंग मशीन, रेफ्रीजिरेटर, कम कीमत वाली कारें और माइक्रोवेव ओवेन अपने साथ रिश्ते, प्रेम, सहनशीलता और सुखी जीवन की नयी परिभाषाएं लेकर आए। ये सभी वस्तुएं एक ऐसे परिवार की पृष्ठभूमि में होती थीं जो जीवन की छोटी-छोटी खुशियों में यकीन रखता था। वे एक-दूसरे का ख्याल रखते थे। बहुत मामूली सी बातें उनके रिश्तों की सघनता का संकेत दे जाती थीं। इस तरह एक इंसानी जिंदगी के तमाम रिश्तों को उसने इन विज्ञापनों से ही महसूस किया। पिता का अपने बच्चों के प्रति स्नेह, बच्चों का माता-पिता के प्रति आदर और प्रेम, या फिर भाई-बहन के बीच खिलंदड़ेपन से भरी आत्मीयता। तस्वीरों की मदद से इन रिश्तों से मन में उमडऩे वाली भावनाएं, खुशी और विषाद सब कुछ उसने महसूस किया था। वैसे उसकी खुद की मां विज्ञापनों के इस संसार से बिल्कुल अलग थी। उस पर हमेशा एक किस्म का अवसाद छाया रहता था। उसे सिर्फ रोज के काम निपटाने की चिंता रहती थी या बस इतनी कि उसके बेटे ने खाना खाया या नहीं। वह जानता था कि इन दिनों जब वह अपनी मां से हजार किलोमीटर दूर है, वह किस कदर गुमसुम सी जिंदगी जी रही होगी। यहां तक कि अगर वह बीमार पड़ गयी तो पड़ोसियों को इसकी खबर तक नहीं होगी। वह अपनी मां को फोन नहीं करना चाहता था। कभी फोन पर बात होती तो उधर से आती मां की आवाज में ऐसी लरज होती थी जो उसे घसीटती हुई बरसों-बरस बितायी उदासी से भरी जिंदगी में दोबारा फेंक देती। उसका दम घुटने लगता। वह जितना ही छुटकारा पाने के लिए हाथ-पांव मारता, उतना ही अपने स्याह अतीत में और धंसता जाता।

अब तो इस शहर में आये उसे कई साल बीत चुके थे। वह रेलवे लाइन के पार बने बेतरतीब मकानों और तंग गलियों वाले मोहल्ले में रहता था। यह इलाका काफी ढलान पर बसा हुआ था। इसकी वजह से बरसात में यहां अक्सर पानी भर जाता था। इसी इलाके में सुनसान मोड़ पर एक बहुत बड़े मकान की ऊंची-सपाट दीवारें दिखाई देतीं – जो धूप और बारिश की मार झेलकर बदरंग हो चुकी थीं और जिसकी दरारों में पीपल की कोंपलें फूट पड़ी थीं। वह दरअसल शहर के एक पुराने व्यापारी की कोठी का पिछला हिस्सा था। इसी मकान की तीसरी मंजिल पर टीन की छत वाली बरसाती में वह किराये पर रहता था। वहां तक जाने के लिए जीना बाहर गली में ही खुलता था। इसी टीन की छत वाली बरसाती में वह लड़की मौजूद थी – जो कई शहरों को जोडऩे वाली हजारों किलोमीटर लंबी सड़क के किनारे लगे होर्डिंग से रातों-रात गायब हो गयी।

उस दिन जब वह घर पहुंचा तो शाम हो गयी थी। मौसम खुला था। छत पर गया तो देखा कि जिस तरफ अभी-अभी सूरज डूबा था, उस तरफ दर्जनों पतंगें हवा में हलके-हलके कांप रही थीं। उसे अपना बदन हल्का तपता सा लगा और पेट के निचले हिस्से में मुलायम ऐंठन हुई। सुबह घर से निकलते वक्त वह दरवाजे पर बाहर से ताला लगाकर गया था। ताले में चाभी डालते वक्त उसने भीतर चल रही हलचल को भांपने का प्रयास किया, लेकिन भीतर नि:स्तब्धता थी। वह दरवाजा खोलकर अंदर गया तो देखा लड़की फर्श पर घुटने मोड़े सो रही थी। इस वक्त वह क्लैमरस मॉडल नहीं बल्कि किसी आम सुंदर लड़की जैसी दिख रही थी। अगस्त की उमस के चलते उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आयी थीं। कमरे से लगे छोटे से चौकोर किचेन में खाली बरतनों से अंदाजा लग गया कि दुपहर में उसने अपने खाने के लिए कुछ पकाया भी था। वह खुद भी फर्श पर बैठ गया और उसे सोते हुए देखता रहा।

जो उसे हमेशा से देखते चले आये थे, उन्होंने महसूस किया कि इन दिनों उसके तौर-तरीके थोड़े बदले हुए हैं। वह सीढिय़ां तेज कदम से चढऩे लगा था। उसकी कंपोजिंग में गलतियां होने लगी थीं। घर लौटते वक्त वह नुक्कड़ पर रिक्शेवालों से घिरी दुकानों से बन और मक्खन की टिक्की खरीद लेता था, ताकि घर पर इंतजार कर रही लड़की कुछ खा सके। पहली बार वह किसी के साथ सचमुच जिंदगी गुजार रहा था। उसे चाकलेट कंपनी का वह विज्ञापन याद आ गया जिसने सबसे पहले उसके जेहन में साहचर्य का भाव विकसित किया था। उसे एहसास हुआ कैसे दो इंसान उम्र और रिश्तों में अलग-अलग होते हुए भी एक दूसरे के मन की बात को समझ सकते हैं। अब तो उन दोनों के बीच बातचीत भी शुरू हो गयी थी। शुरुआत उस लड़की ने ही की थी। जब पहली बार लड़की की आवाज कानों से टकराई तो एक पल के लिए उसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ। बहुत साफ आवाज और बहुत स्पष्ट से शब्द।

‘तुम मुझे पहचानती थी?’
‘हां, सचमुच, तुम सबसे पहले थे – जिसने मेरी तरफ आंखें उठाकर देखा, जैसे मुझे सचमुच जानते हो…’
‘मैंने देखा कि तुम मुझे देख रही थी…’
‘हां, मैं तुमको ही देख रही थी, तुम कितनी रात गये उधर से अकेले जाते थे।’
‘मैंने आज तक यह बात किसी को नहीं बतायी है कि तुम मुझे देखती रही और अब मेरे पास हो।’
‘किसी को भी बताना भी मत…’
‘… पर तुम कौन हो?’
‘जैसे तुम हो, वैसे ही मैं भी हूं!’

लड़की ने उसे तमाम दिलचस्प बातें बतायीं। जैसे कि वह किसी मॉडल की प्रतिछाया नहीं है। वह एक महत्वाकांक्षी एड डिजाइनर की कल्पना है। वह अपने एड के लिए ऐसी लड़की चाहता था जो ‘यूनिक’ हो। उसने अपने कंप्यूटर में सैकड़ों युवतियों की तस्वीर को फीड करने के बाद उसका निर्माण किया। उसे एक व्यक्तित्व दिया गया। उसे सुंदरता, मुस्कुराहट और शोखी दी। लड़की ने कहा कि उन दोनों में कोई खास फर्क नहीं है। विज्ञापनों ने ही उसकी भी शख्सियत तैयार की है। उसे यह सच लगा- इन्हीं विज्ञापनों ने तो उसे सोचना सिखाया, सहानुभूति, प्‍यार, आदर और तपती हुई वासना का एहसास कराया था। लड़की ने हंसते हुए कहा – तुम दरअसल तुम नहीं हो, तुम तो हजारों विज्ञापनों की एक संरचना हो – बिल्कुल मेरी तरह। बस फर्क इतना है कि तुम दर्पण के उस तरफ हो और मैं इस तरफ। यह तुम कैसे साबित कर सकते हो कि दर्पण के इस तरफ असलियत है और दूसरी तरफ झूठ। वह उसे सुनता रहता था। शाम ढल जाती थी। कभी-कभी अचानक पानी बरसने लगता। घरों की बत्तियां जल उठती थीं। बाहर की रोशनी उसकी बरसाती में छनती हुई गिरती। इस अंधेरे-उजाले के बीच लड़की की सफेद आंखें चमकती हुई दिखाई देतीं। उसकी बहुत साफ फुसफुसाहट सुनाई देती और अंधेरे में कांच के टूटकर बिखर जाने जैसी हंसी भी।

वह पिछले कई दिनों से बिना किसी सूचना के दफ्तर से गायब था। उसका पूरा वक्त अब अपनी बरसाती में गुजरता था। भूख लगती तो बाहर से ताला लगाकर वह बचे हुए पैसे गिनता सीढ़ियां उतरता था और अगली गली से खाने-पीने का सामान खरीद लेता। दोनों साथ बैठकर खाना खाते और फिर बातें करते हुए वहीं फर्श पर लेटे-लेटे सो जाते। अर्सा पहले एक कंपनी ने यह समझाया था कि घड़ियां सिर्फ समय देखने के लिए नहीं होतीं, वे अगर तोहफा बनें तो प्यार के इज़हार का तरीका भी होती हैं और शरीर का आभूषण भी। उस विज्ञापन ने समझाया समय सिर्फ वह नहीं जो घड़ी में नजर आता है, समय वह है जो जीवन में घटित होता है, घड़ी तो उसका महज गवाह होती है। उस विज्ञापन में आर्केस्ट्रा की एक खास धुन बजती थी। बिथोवन और मोजार्ट की तरह – 45 सेकेंड का एक टुकड़ा – जैसे सागर की लहरें बहती चली आ रही हों।

इधर बीते पांच दिनों फिर लगातार पानी बरस रहा था। आसमान में जाने कहां से बादल उमड़ते चले आ रहे थे। झड़ी पंद्रह मिनट को भी नहीं थमती थी। शहर के पश्चिमी छोर पर बलखाती नदी अब विस्तार लेने लगी थी। शहर के निचले इलाकों में पानी भरने लगा था। नालों में अनवरत शोर करता हुआ पानी बहता रहता था। पुराने मकानों की छतें रिसने लगी थीं। सिनेमा के पोस्टर बारिश में भीगकर बेरंग हो गये थे। बिजली के तारों पर बूंदों की झालर बनी दिखाई देती थी। स्कूलों के मैदान पानी से भर गये थे और वहां शाम होते मेढकों का टर्राना शुरू हो जाता। दुकानों पर काम करने वाले लड़के क्लास्टिक की सिली हुई पन्नियों से खुद को ढके इधर-उधर भागते नजर आते। यह एक ऐसा मौसम था जब मन बेवजह उदास हो जाता है और इंसानी गरमाहट की जरूरत महसूस होती है।

वे बातों-बातों में एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। इतना कि लड़की के शरीर से उठती खुशबू उसके नथुनों से टकराने लगती। वह लेटे-लेटे सोई हुई लड़की की सांसों के साथ उठते-गिरते सीने को देखता रहता। उसे विज्ञापन में देखी तौलिये में लिपटी आधी से ज्‍यादा खुली जांघें याद आने लगतीं या साबुन के विज्ञापनों दिखाई देती अनावृत्त पीठ और वक्षस्थल के आभासी हिस्से। उसका गला सूख जाता। ठीक वैसे ही जैसे सालों पहले ट्रेन में बिकनी पहने लड़की की तसवीर देखकर सूखा था। उस शाम लड़की का टाप पेट से बित्ते भर ऊपर खिसका हुआ था और जींस के बटन से थोड़ा ऊपर उसकी नाभि दिखाई दे रही थी। बौछारों से भरी हवा उसकी बरसाती की खिड़कियों से टकरा रही थी। इस शहर में कोई नहीं जानता कि होर्डिंग से निकलकर कोई नौजवान लड़की उसकी बरसाती में बेखबर सो रही है। आखिर वह उसी संसार का हिस्सा थी जो हमेशा उसकी पहुंच से बाहर रहा। वह एक घुटन भरी मटमैली सी जिंदगी जीता रहा और उस संसार की चकाचौंध बढ़ती रही।

उस लड़की की त्वचा की रंगत में एक किस्म की गहराई थी – जैसे बहुत दूध डालकर बनायी गयी चाय की रंगत। उस शरीर से गुजरते हुए एक दूसरी दुनिया के दरवाजे खुलते थे, जहां हंसते हुए ईमानदार लोग थे, रिश्तों की कद्र करने वाले, मन की बातें समझने वाले और छोटी-छोटी बातों में खुशी तलाशने वाले लोग थे। उसने लड़की के पेट के निचले हिस्से पर कसी हुई जींस का बटन खोल दिया। चेन अपने-आप नीचे खिसक गयी। भीतर उसने काले रंग की लेस वाली पैंटी पहन रखी थी। उसी वक्त लड़की की आंखें खुल गयीं थीं। शहर पर झुके बादलों में लगातार गडग़ड़ाहट हो रही थी। तभी शायद लड़की ने जो कुछ कहा वह उसे सुनाई नहीं दिया। बादलों की गडग़ड़ाहट बहुत देर तक समान में भटकती रही। वह स्तब्ध सा उसके ऊपर झुका रह गया। लड़की की आंखों में रोष भरी नमी थी।

बरसाती में बहुत देर तक चुप्पी छायी रही। उसके मन में ग्लानि थी। उसे अचानक हजार किलोमीटर दूर छूट गयी अपनी मां की याद आयी। याद आया कि कैसे मां घर के पिछवाड़े की थोड़ी सी कच्‍ची जमीन पर उगायी सब्जियों को सुबह के धुंधलके में तोड़ा करती थीं। वह ओस से भीगी उनकी पत्तियों को देखता रहता था। उस याद आया जब वह पैसे जोड़कर अपनी मां के साथ जूते की दुकान पर पहुंचा था। मां एक सस्ती सी चप्पल ली थी और उसके लिए कपड़े का सफेद जूता – उससे मिलता-जुलता जूता उसने किसी मैगजीन के एड में देखा था। उसे बहुत सी और बेमतलब की बातें याद आयीं और फिर एक रुलाई सीने के भीतर उमड़ने-घुमड़ने लगी। वह फूट-फूटकर रोने लगा। लड़की अंधेरे में उसे टकटकी लगाये देखती रही। उसकी आंख खुली तो चेहरा आंसुओं से तरबतर था। बिजली की कौंध में घड़ी की सूइयां चमकीं। रात के नौ बज रहे थे। कमरे में चारों तरफ लड़की कहीं नहीं दिखाई दी। उसने जल्दी-जल्दी किचेन और बाथरूम भी छान मारा। बाहर झांका तो पानी लगातार बरस रहा था – पूरे शोर के साथ। बरसाती और नीचे सीढ़ी का दरवाजा खुला था।

उस रात जैसे आसमान फट पड़ा। इस पूरे मौसम में ऐसी बारिश कभी नहीं हुई। सड़क से लगे चबूतरों की सीढिय़ां पानी में पूरी डूब गयीं। कुत्ते पानी में तैरते हुए इधर से उधर भाग रहे थे। गलियों में घुटनों तक हरहराता पानी बह रहा था। उसने देखा पानी में अखबारों के टुकड़े बहे चले जा रहे थे। सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन, चाय के खाली डब्‍बे पर मुस्कुराती गृहणी और दीवारों से उखड़े सिनेमा के पोस्टर उस तेज धार में नाचते हुए आंखों से ओझल हो गये। वह लड़की को खोजने के लिए भटकता रहा। मंडी में बने विशालकाय गोदाम – जहां छत पर बने पाइपों से शोर करता हुआ पानी नीचे गिर रहा था, टखनों तक पानी से भरी गलियां, सड़क के किनारे खड़ी ट्रकों की अंतहीन कतार – वह कहीं नहीं मिली। उसे अपने पेट के निचले हिस्से में फिर ऐंठन सी महसूस हुई, मगर इस बार ज्‍यादा तकलीफदेह। उसे कंपकंपी सी लगी और नथुनों से आती-जाती सांस गरम महसूस हो रही थी। उसे फिर बुखार आ गया था। वह भागता हुआ हाइवे की तरफ जा रहा था। सड़क के बगल से नाला गुजरता था। उसमें से ऐसा शोर उठ रहा था जैसे किसी पहाड़ी नदी से उठता है।

पूरे शहर में बिजली नहीं थी। होर्डिंग खाली और अंधेरे में डूबा हुआ था। बारिश में सुस्त चींटों की तरह डोलते ट्रक उस महानगर की तरफ से आ रहे थे, जो वहां से सिर्फ दो सौ किलोमीटर दूर था। उसे यकीन था कि लड़की उसी तरफ लौटेगी। वह लोहे के उन भारी-भरकम एंगल के पास कांपता हुआ खड़ा हो गया, जिन पर वह विशाल होर्डिंग टिका था। उसने खुद को शांत करने का प्रयास किया मगर उसके भीतर कंपकंपी बढ़ती चली गयी। जब पैर इस कदर थरथराने लगे कि उसे लगा कि अब खड़ा हो पाना मुश्किल होता तो वह ऐंगल पकड़कर दोहरा हो गया। उसके पेट में फिर तकलीफदेह ऐंठन शुरू हो गयी। पानी लगातार बरस रहा था। वह पानी से इस कदर तरबतर हो गया था कि उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी। माथे से बहता पानी नाक-मुंह के भीतर घुसता चला जा रहा था। वह घुटनों के बल वहीं कीचड़ में बैठ गया और अपने हाथों से इस तरह सिर को छिपा लिया जैसे गांव वाले पुलिस की पिटाई से बचने के लिए करते हैं।

अगली सुबह भी आसमान में बादल छाये थे और हल्की फुहार गिर रही थी। हाइवे पर एक लावारिस शव मिला। उस विशाल होर्डिंग के नीचे – जिस पर मुस्कुराती खूबसूरत लड़की का अक्स था। पानी से सराबोर शरीर बिल्कुल ठंडा और अकड़ा हुआ था। जेब में मिले कागजों से पता लगा कि वह उसी शहर से छपने वाले अखबार के दफ्तर में एक कंपोजीटर था। उसके साथ काम करने वाले लोग भी उसके बारे में बहुत कम जानते थे। उसके कमरे की छानबीन से भी कुछ खास पता नहीं चला। किचेन देखने से लग रहा था करीब दो हफ्ते से उसमें खाना नहीं पका है। अलबत्ता उसके रूम में अखबारों और पत्रिकाओं से काटी गयी विज्ञापनों की ढेरों कटिंग बरामद हुई। उनमें से बहुत सी कमरे में बिखरी हुई थीं और कई पालीथीन में सहेज कर रखी हुई थीं। घर में बन और डबलरोटियों के खाली रैपर छिटके हुए थे। एक लेटर पैड पर चार-पांच लाइनें लिखी हुई थीं। शायद वह अपनी मां को चिट्ठी लिख रहा था…

उस रात फिर बहुत पानी बरसा और विज्ञापन वाली लड़की मुस्कुराती रही!

एंग्री बर्ड्स की पॉलीटिक्स क्या है?

एंग्री बर्ड्स बच्चों की मासूम फिल्म नहीं है। यह एक पॉलिटिकल फिल्म है। या कहें तो यह एनीमल फॉर्म की तरह एक बेहद स्पष्ट पॉलिटिकल एलेगरी है। जो सीधे-सीधे यूरोपीय देशों में शरणार्थियों की समस्या, इस्लामिक आतंकवाद और अमेरिका की नीतियों पर बात करती है। यह हॉलीवुड की तमाम बेहतरीन एनीमेशन फिल्मों जैसे द लॉयन किंग, टॉय स्टोरी, अप, बोल्ट और फ्रोजन की तरह मानवीय संवेदनाओं से भरी फिल्म नहीं है। यह एक सपाट प्रापगैंडा फिल्म है।

काश यह फिल्म सिर्फ अमेरिकी प्रापगैंडा तक ही सीमित होती… मगर यह एक नस्लवादी फिल्म भी है। फिल्म में साफ तौर पर दिखाया गया है कि किस तरह कुछ एक आइलैंड जहां पर शांतिप्रिय परिंदे मौजूद हैं उनके बीच पिग्स बहाने से आते हैं। परिंदे टापू में उनका स्वागत करते हैं और दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाते हैं। रेड बर्ड जो फिल्म का नायक है, हमेशा उन्हें संदेह की दृष्टि से देखता है। फिल्म का खलनायक एक हरा पिग है, जिसकी दाढ़ी देखकर समझा जा सकता है कि उसे एक अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक समुदाय के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है। इसमें एक शरारत भी है, क्योंकि पिग इस धार्मिक समुदाय में घृणित माना जाता है।

फिल्म के नायक की दिक्कत यह है कि वह अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाता। इस थीम को लेकर फिल्म दोहरे स्तर पर मौजूदा शरणार्थी नीतियों और अमेरिका की उदारवादी नीतियों का मजाक उड़ाती है। फिल्म में शांतिप्रिय परिंदे दरअसल मूर्ख साबित होते हैं, जो अपने दुश्मनों को पहचान नहीं पा रहे हैं बल्कि उनकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं और अपने टापू पर उन्हें रहने की इजाजत भी दे रहे हैं। इतना ही नहीं वे इतने मूर्ख हैं कि जब रेड बर्ड उन्हें खतरे से आगाह करना चाहता है तो वे उसकी सभी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं।

रेड बर्ड अपने दो साथियों के साथ उस महान परिंदे यानी बाज से मदद मांगने जाता है, जिसे सारे परिंदों का मार्गदर्शन माना जाता है। यह बाज दरअसल अमेरिकन ईगल है, जिसे 1782 में यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका ने अपना राष्ट्रीय पक्षी मान लिया था। फिल्म अमेरिका के इस प्रतीक को आलसी और अतीत में जीने वाला दिखाती है। जिसके पास सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों और दिखावटी आदर्श के अलावा कुछ नहीं है। वह इतना बूढ़ा हो चुका है कि उन परिदों की कोई मदद नहीं कर सकता।

इस बीच पिग्स सारे अंडे चुरा ले जाते हैं और रेड बर्ड तय करता है कि सभी बर्ड्स को क्या करना चाहिए। सबसे पहले वे अपनी सोच में बदलाव लाते हैं और गुस्से को अपना हथियार बनाते हैं। यहां क्रोध को एक ऊर्जा के रूप में लिया गया है। यह क्रोध पिग्स के प्रति नफरत से उपजता है और वे पिग्स की बस्ती पर हमला कर देते हैं। फिल्म का पूरा प्लॉट Xenophobia पर आधारित है। जहां दूसरे देश के लोगों के प्रति नफरत या दुराग्रह की भावना होती है।

फिल्म के रंगों में प्रतीकों की भरमार है। पिग्स का रंग हरा है, जो उस धार्मिक समुदाय का रंग भी है, जिसको फिल्म में लक्ष्य किया गया है। बाज बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी। रेड बर्ड को गौर से देखने के बाद उसका रंग संयोजन नाजी झंडे की याद दिलाता है – सफेद और लाल रंग। फिल्म में रेड बर्ड और उसके साथी जर्मनी के झंडे का रंग तैयार करते हैं। काला, लाल और पीला।

इतना ही नहीं फिल्म में बड़ी बारीकी से रेसिस्ट और इस्लामोफोबिक अवधारणाएं रची गई हैं। पिग्स का जहाज विस्फोटक सामग्री से भरा हुआ है। इतना ही नहीं उनके शहर भी बारूद के ढेर पर बसे हैं। जब रेड वर्ड जहाज पर पहुंचता है तो वहां पर प्रमुखता से एक किताब फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रीन दिखाई जाती है। इसी तरह से शुरु में ही एक पिग एक फीमेल बर्ड की तरफ जिस तरह लपकता है, वह इस धारणा को बल देता है कि पिग्स सेक्सुअल हमले भी कर सकते हैं। जब पिग्स आइलैंड में धमाके करते हैं तो कुछ संवाद पेरिस में हुए आतंकी हमले का संदर्भ लेते हैं।

कुल मिलाकर एंग्री बर्ड ने सिनेमा के इतिहास में एक बुरी और नस्लवादी फिल्म के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया है। इसमें फूहड़ किस्म के राजनीतिक और नस्लवादी मजाक हैं जो इसे कहीं से भी एक कला का दर्जा देने की स्थिति में नहीं रखते।

आखिर बॉलीवुड को मिल गया एक सच्चा और रीयल फैमिली ड्रामा

आखिर किसी ने तो ऐसी फिल्म बनाई, जहां हम एक भारतीय परिवार को बिल्कुल उस तरह से देख सकते हैं जैसे कि वे सचमुच में हैं। अपनी तमाम लाचारियों, तकलीफों, कमजोरियों और खुशी के लम्हों के साथ। फिल्म का प्रोमो देखकर लगता है कि यह फर्जी खुशियों को दर्शाने वाली एक बनावटी सी फिल्म है मगर इसके उलट यह डार्क और खुरदरी है।

मगर ठहरिए, बस इतना कहने से मैं इस फिल्म पर सतही बातचीत कर पाऊंगा। बात इससे कहीं आगे जाती है। कपूर एंड सन्स में हम जो देखते हैं वो देश के लाखों मध्यवर्गीय परिवारों का मानों एक प्रतिबिंब है। आर्थिक पृष्ठभूमि बहुत मायने नहीं रखती… क्योंकि कमोवेश सपने तो सभी एक जैसे देखते हैं। सभी के मन में ईर्ष्या उठती है, सभी दुखी होते हैं और सभी जीवन में किसी न किसी मोड़ पर धोखा खाते हैं।

यह फिल्म मुझे एक बिल्कुल दूसरे सवाल की तरफ ले जाती है। हमारे यहां फिल्मों और किताबों में दिखाए गए परिवार इतने अवास्तविक और यूटोपियन से क्यों होते हैं? मुझे याद है जब मैं छोटा था तो ‘पारिवारिक फिल्म’ हिन्दी सिनेमा का एक टाइप था, जिसमें एक सुखी परिवार और उससे ईर्ष्या करने वाले और उसमें आग लगाने वाले कुछ लोग होते थे और अंत में सब कुछ सही हो जाता था। मगर वे परिवार में अपने आस-पास कहीं नहीं नजर आते थे।

हमें सिनेमा और साहित्य में वैसे परिवार क्यों नहीं दिखे जैसे रूसी उपन्यासों में दिखते हैं… खुरदुरी वास्तविकता और प्रेम के सोंधेपन के साथ। तो कपूर एंड सन्स एक ऐसी ही फिल्म है जो भारतीय पारिवारिक फिल्मों के सारे मानदंड तोड़ती हुई, उन्हें खारिज करती हुई चलती है।

यह करन जौहर की फिल्म है, एक पॉपुलर फिल्म है। मगर अच्छी बात यह है कि यह पॉपुलर होने के लिए समझौते नहीं करती। कपूर एंड सन्स का परिवार उतना ही अटपटा है जितना अक्सर एक परिवार होता है।

एक दादा जी (ऋषि कपूर) यानी अमरजीत कपूर, उनका बेटा (रजत कपूर) जो नौकरी छोड़कर बिजनेस करने की कोशिश में आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। उनकी बहू सुनीता (रत्ना पाठक) जो परिवार के हर सदस्य की इमोशन की डोर से बंधी हुई है। फिर कपूर साहब के पोते यानी अर्जुन (सिद्धार्थ मलहोत्रा) और राहुल (फ़वाद खान)। बड़े अटपटे ढंग से दोनों ही लेखक हैं, एक सफल मगर दूसरा असफल।

कहानी किसी वेस्टर्न प्ले जैसी है। जहां ड्राइंग रूम ड्रामा है, सब कुछ एक ही लोकेशन और परिवार के सदस्यों के बीच घट रहा है। धीरे-धीरे हम कपूर फैमिली के अंधेरे कोनों से परिचित होने लगते हैं। हमें हैरत होती है कि किस तरह चटकने की हद तक पहुंच जाने के बाद भी वे सदस्य मजबूती से परिवार नाम की संस्था को अपने कंधों पर उठाए हुए हैं।

फिल्म सवालों के जवाब नहीं देती, फिल्म की एक और खूबी है कि वह अपने पात्रों का दुख हल्का नहीं करती। चाहे वह टिया (आलिया भट्ट) के साथ हुई त्रासदी हो या अर्जुन के मन के किसी कोने में छिपी तकलीफ या राहुल की उलझन।

शायद यही वह बिंदु है जब यह फिल्म रूसी उपन्यासों की याद दिलाती है। खास तौर पर फिल्म देखते हुए मैक्सिम गोर्की और तोलस्तोय के परिवार याद आने लगते हैं। दुख जस का तस रहता है, दुख कम नहीं होता मगर जिंदगी आगे बढ़ती है तो सुकून के पल भी आते हैं।

दादा जी परिवार को एक कड़ी में बांधने वाले शख्स का काम करते हैं। फिल्म का एक दृश्य जहां परिवार मिलकर एक गीत गा रहा है- अद्भुत है। सबका मिलकर खुश होना उनके निजी दुख को और गहरा कर देता है।

फैमिली फोटो खींचना और दादा जी की बर्थडे पार्टी… इन्हीं दो बिंदुओं के इर्द-गिर्द फिल्म की पटकथा बुनी गई है और जिस तरह बुनी गई है वो अद्भुत है। पात्रों के आपसी संवाद उसी तरह चलते हैं, जैसे कि वास्तविक जिंदगी में। इसकी पटकथा का तानाबाना इस तरह है कि वह ऊपरी स्तर पर भले सहज लगे मगर सतह के नीचे की जटिलताओं का भी लगातार एहसास होता रहता है।

कहानी में कोई पेंचोखम नहीं, कोई उतार-चढ़ाव नहीं, मगर कुछ देर बाद हमें लगता है कि हम किसी आर्केस्ट्रा में बैठे हैं। जहां हर वाद्य (या चरित्र) अपने मूल अस्तित्व के साथ किसी संगीत रचना (मूल कथा) का निर्माण कर रहा है। बस जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है, हमें धुन ज्यादा स्पष्ट होकर समझ में आने लगती है… शायद यही हमारे भारतीय परिवारों की हारमोनी है।

तमाशाः दिल और दुनिया के बीच एक फिल्म

“पापा मैं एक कहानी सुनाऊं?”
“हां !”
“बहुत पहले की बात है/ एक आदमी हुआ करता था/ उसका नाम था हीरो… “उसने बहुत मेहनत की/ इंजीनियरिंग, नौकरी, ऑफिस, हां बोलो, नीचे देखो, हंसो, रोने लगो… “एक दिन यहां से बहुत कोस दूर/ दिल और दुनिया के बीच अपने हीरो को एक साथी मिला…”

‘तमाशा’ देखकर आपको विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म ‘उड़ान’ की याद आ सकती है। शायद यह फिल्म ‘उड़ान’ के उस किशोर का वैकल्पिक भविष्य है। एक विस्तार। उसके युवा होने की कथा…

अगर उसके जीवन में कुछ भी न बदलता।

बाकी सबकुछ वही है। कहानियां सुनने और जीने की ललक। जीवन में कुछ चुनने की अनिवार्यता से पैदा होने वाली उलझन। एक ही जीवन में कई जीवन जी लेने की आकांक्षा।

‘तमाशा’ देखकर आपको और भी बहुत कुछ याद आ सकता है। कोई क्लासिक उपन्यास, कोई ग़जल, कोई कविता… मगर जो याद आएगा वह इसी फिल्म की तरह किसी बेचैनी को अभिव्यक्त कर रहा होगा।

सतही और सपाट किस्म की कहानियों और फिल्मों के साथ जीने वालों को यह फिल्म उबाऊ लग सकती है, मगर फिल्म अपने विषय के हिसाब से अपना खुद का व्याकरण रचती है। या दूसरे शब्दों में कहें तो व्याकरण तोड़ती है।

ठीक उसी तरह है जैसे कविता व्याकरण को तोड़कर अर्थ की रचना करती है। इसीलिए इम्तियाज अली की फिल्में कविता के ज्यादा करीब हैं। वे फिल्म के केंद्रीय भाव को ज्यादा महत्व देते हैं।

इसी फिल्म के संवाद लंबे हो सकते हैं मगर वे उस थीम को, उस केंद्रीय भाव को टटोलते हैं। जरा देखें-

दीपिकाः “ये तुम नहीं हो वेद, ये सब नकली है।”
रनबीरः “मैं वो डॉन थोड़ी ना हूं तारा, वो तो एक्टिंग थी ना, वो मैं एक रोल प्ले कर रहा था और ये मैं रीयल में हूं।”
दीपिकाः “फिर तो मैं किसी और के साथ हूं वेद, मैं कुछ और ढूंढ़ रही हूँ।”

खुद को पहचानने और खुद के करीब जाने की ललक ही तमाशा का वह केंद्रीय भाव है, जिसके चारो तरफ फिल्म को बुना गया है। इम्तियाज अली की फिल्मों में इंडीविजुअलिटी का भाव बहुत गहरा है। उतना ही गहरा जितना कि कभी गुरुदत्त की फिल्मों दिखता था।

बस फर्क इतना है कि गुरुदत्त की ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ जैसी फिल्मों के नायकों की आत्मकेंद्रियता में दरअसल सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश काफी साफ था, वो यहां तक आते-आते धुंधला पड़ता गया है। इसके अपने सामाजिक, राजनीतिक कारण होंगे फिलहाल अभी हम उन पर चर्चा नहीं करते हैं।

पर हम यह देख सकते हैं कि ‘तमाशा’ पॉपुलर कल्चर के अपने रूट्स को भी तलाशती है। खास तौर पर राजकपूर की पिल्मों के। फिल्म के दो दृश्य इस कांटेक्स्ट में खास तौर पर याद रखना चाहिए। फिल्म के शुरु और अंत में स्टेज के सीन में एक जोकर है, जो ‘मेरा नाम जोकर’ के प्रतीक की याद दिलाता है और उस फिल्म की थीम में भी क्या प्रेम और अभव्यक्ति की छटपटाहट नहीं थी?

एक और सीन याद करें-

रनबीरः (कटाक्ष के साथ) “तुझे तो प्यार हो गया है पगली!”
दीपिकाः “हां… हां वेद।”
रनबीरः “पर किसी और से…”

प्रेम की इतनी उत्कटता अब बहुत कम दिखती है। इस सीन में आपको राजकपुर और नरगिस की फिल्म ‘आवारा’ के शैडोज़ दिखेंगे। एक-दूसरे की आंखों में झांकते किरदार, बैकलाइट, दीपिका के चेहरे पर झुका हुआ रनबीर।

बहरहाल ‘तमाशा’ सफल हो या न हो, यह इस दौर की एक ऐसी फिल्म है जिससे बहुत से संवेदनशील युवा खुद को जोड़ पाएंगे। इसलिए नहीं कि वे दीपिका और रनबीर की ड्रेसेज और स्टाइल को फॉलो कर सकें बल्कि इसलिए कि यह फिल्म हमें एक बार अपने भीतर झांकने को कहती है।

रनबीरः “वही कहानी फिर एक बार, मज़नू ने लिए कपड़े फाड़, और तमाशा बीच बाज़ार…”

कहानी वही है। कई बार सुनी, कई बार कही गई। मगर वह फिर उसी हौसले से बीच-बाजार फिर से हमारा गिरेबां थामकर हमारे कानों में कुछ फुसफुसाकर चली जाती है।

एक एलियन, एक देहाती, एक कबीर

‘पीके’ का एलियन भोजपुरी बोलता है। उसके ग्रह पर कोई भाषा नहीं है। कहानी के संयोग उसके लिए जिस भाषा को चुनते हैं वह इस विशाल देश के बड़े भू-भाग में पिछड़ों और अशिक्षितों की भाषा मानी जाती है। “…तुम्हारे प्लैनेट की राष्ट्रभाषा भोजपुरी है?” अनुष्का सवाल करती है। ‘पीके’ की भोजपुरी (या भोजपुरी जैसी कोई भाषा) सरल हास्य पैदा करती है मगर राजकुमार हीरानी इस सहज हास्य से कहीं आगे तक जाते हैं। ‘पीके’ की भाषा फिल्म को डि-कोड करने की बुनियादी कुंजी है।

एक वाजिब सवाल मन में उठ सकता है, हीरानी की फिल्म को डी-कोड करने की क्या जरूरत है?  सब कुछ कितना सरलीकृत है यहां पर। न कोई जटिल यथार्थ, न परत-दर-परत डेवलप होती पटकथा, न मुश्किल किरदार। तो फिर डि-कोड किसे करना है?  दरअसल ‘पीके’ उतनी ही सरल है जितने कि कबीर। जो सहजता और खिलंदड़ेपन से जीवन का सत्य कह देते हैं- माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय। राजकुमार हीरानी की फिल्म बनाने की शैली में कबीर के इसी खिलंदड़ेपन के बीज हैं। जहां वो गंभीर कथन को एक विडंबनापूर्ण या अटपटी स्थितियों से उपजे परिहास में बदल देते हैं। परिहास मार्मिक होता है और मर्म में जीवन का सच छिपा होता है। बिल्कुल कबीर की उलटबांसियों की तरह।

तो लौटते हैं भाषा के जरिए इस फिल्म को डि-कोड करने के फार्मुले पर। दरअसल भोजपुरी की खूबी यह है कि इस भाषा की अनगढ़ संचरना में भी अद्भुत तंज़ है और अंडरस्टेटमेंट की तो ऐसी भरमार है कि अंग्रेजी सामने खड़ी हो तो शरमा जाए। इसलिए ‘पीके’ में सभ्य समाज या धर्म के पाखंडो पर हंसने के लिए इससे बेहतर बोली का चुनाव नहीं किया जा सकता था। एक उदाहरण देखिए, “एक बार तो ऐसा गजब का कपड़ा मिला जौन पहिने से इस फोटो (हमारे नोट, जिस पर गांधी की तस्वीर छपी रहती है) का जरूरत ही नहीं पड़ता था, खाना अपने-आप पास आ जाता था।” अब जरा गौर करें, अगर ‘पीके’ के तमाम संवाद इस बोली की बजाय सीधी-सादी हिन्दी में होते तो स्थिति क्या होती। ऐसे संवाद न सिर्फ सपाटबयानी में बदल जाते, न सिर्फ कड़वाहट पैदा करते बल्कि गलतफहमियां भी जन्म लेने लगतीं और आरोप-प्रत्यारोपों का एक अंतहीन सिलसिला शुरु हो जाता। पीके कहता है, “समझ में आया… कि इस फोटो का भैल्यू सिर्फ एक कागज पर है। दूसरे कागज पर इस फोटो का भैल्यू जीरो बटा लुल।” गांधी को हमने अपने सार्वजनिक जीवन में कितनी अहमियत दी है इसे इस संवाद में जितने बेहतर तरीके से सामने लाया गया है, परंपरागत भाषा में क्या यह संभव था। कई बार सत्य को सामने लाने के लिए भाषा में तोड़-फोड़ करनी पड़ती है। चाहे वह हमारे आपसी संप्रेषण की भाषा हो या सिनेमा की भाषा। ‘पीके’ दोनों स्तरों पर यह तोड़-फोड़ करती चलती है, वह कबीर की उलटबांसियों की तरह विरल और अटपटे संयोग रचती है।

दिल्ली की एक मेट्रो में पीला हैलमेट पहनकर परचे बांटता पीके जितना अजीब जग्गू (अनुष्का) को लगा होगा, हमें भी उतना ही अजीब लगता है। यह फिल्म ढेरों अटपटी स्थितियों से उपजने वाले हास्य की एक बानगी है। यहां भोजपुरी बोलने वाला एलियन है, एक खूबसूरत सी लड़की है, जिसे सब जग्गू (कभी जैकी श्राफ बना करते थे जग्गू दादा) कहकर बुलाते हैं। या फिर कुछ खांटी किस्म के लोग- जैसे भैरो सिंह (संजय दत्त) हैं जो जीवन को बस उतना ही समझना चाहते हैं जितना जीने के लिए जरूरी है। पीके इस धरती पर एक गलतफहमी का शिकार होता है। उसे लगता है कि भगवान उसकी दिक्कतों का हल निकालेंगे। जैसे-जैसे वह अपनी गलतफहमी के कारण जीवन-मृत्यु, पाप-पुण्य, सही-गलत में उलझता जाता है हमें यह समझ में आने लगता है कि पीके ज्यादा हम सब ‘कन्फ्यूजियाए हुए’ हैं। वह तो हमारे संसार में खाली जगह को बिल्कुल एक खाली जगह की तरह ही देख रहा है। वह सवाल पूछ रहा है मगर सवालों से वो लोग परेशान हो रहे हैं जो नहीं चाहते कि सवाल खड़े किए जाएं। जिस समाज में सवाल नहीं उठते वहां इत्मिनान से मुखौटे पहनकर धोखा देने का एक तंत्र चलता रहता है।

कला जब व्यवस्था पर सवाल करना चाहती है तो उसे कोई संत या उदात्त नायक नहीं एक एलियन या एक देहाती या एक मूर्ख चाहिए होता है। जो मूर्ख समझे जाने का जोखिम उठाते हुए सवाल पूछने का साहस कर सके। जिनके अहमकपने पर लोग कुपित हों, नाराजगी जताएं उसे भला-बुरा कहें, मगर उसका सामना करने से उसके सवालों से रु-ब-रू होने से बचें। उसकी निष्कलुष आंखों में झांककर अपना चेहरा देखने से कतराएं। दोस्तोएवस्की ने ‘अहमक’ (द ईडियट) में ऐसा ही किरदार रचा था तो बिमल मित्र के उपन्यास ‘मुजरिम हाजिर’ का किरदार भी अहमक न सही मगर परेशान करे वाले सवालों के साथ तो खड़ा ही था। कई बरस पहले राज कपूर की क्लासिक ‘जागते रहो’ का देहाती भी ‘पीके’ से अलग नहीं था। उसकी एक रात की मौजूदगी से शहरी जीवन का खोखलापन पूरे जोर के साथ बजने लगता है। वह इस भ्रष्ट ताने-बाने का एक मूक दर्शक भर होता है। पीके को अपना खोया हुआ ‘रिमोटवा’ चाहिए तो ‘जागते रहो’ के देहाती को अपना गला तर करने के लिए पानी। दोनों की एक ही जद्दोजहद है। अपने आप को बचाए रखने का संघर्ष। एक को जीने के लिए पानी चाहिए तो दूसरे को अपने घर जाने का साधन। दोनों की जिजीविषा को विस्तार दें तो वह आम आदमी के जीने के संघर्ष का ही विस्तार है। अपनी इस तलाश के चलते दोनों ही इस व्यवस्था के कुचक्र में फंस जाते हैं। बस, ‘जागते रहो’ का देहाती बोलता नहीं, वहीं पीके पूरी फिल्म में छोटी-छोटी चुटीली उलटबांसियों का इस्तेमाल करता है।

‘पीके’ की खूबी यही है। हीरानी के कथा कहने का यह अंदाज निराला है। गौर करें तो ये मूर्ख देहाती हमारी लोककथाओं में भी जगह-जगह मौजूद हैं। न जाने कितने किस्से हैं, जहां एक गंवार अपनी सहज बुद्धि से लोगों के पाखंड को उजागर कर देता है। पंचतंत्र की एक कथा में अपनी विद्या की शेखी बघारने वाले तीन ब्राह्मण एक मरे हुए शेर को जीवित कर देते हैं, जबकि उनके जिस साथी को गंवार समझा जाता था वह बराबर उन्हें आगाह करता रहता है कि शेर जीवित हो गया तो उन सबको खा जाएगा। जब शेर हमला करता है तो वही मूर्ख अपनी जान बचाने में सफल होता है क्योंकि वह पेड़ पर चढ़ जाता है जबकि उसके विद्वान साथियों ने कभी पेड़ पर चढ़ने जैसी मामूली विद्या सीखने की जहमत ही नहीं उठाई। ‘पीके’ में सहज बुद्धि और विद्वता के पाखंड के टकराव का बहुत ही सटीक चित्रण है। फिल्म में भले ही पीके दूसरे ग्रह से आया प्राणी हो, हमें इसलिए ग्राह्य है क्योंकि हमारी लोक परंपराओं में ऐसे नायक खूब रहे हैं। पीके उस बच्चे की तरह है जो राजा के दरबार में जाकर उसे नंगा कहने का साहस कर बैठता है।

हीरानी की फिल्में दरअसल आधुनिक लोककथाएं ही हैं। उनके किरदार भी लोकगाथाओं जैसे हैं। मुन्नाभाई, सर्किट, ‘पीके’ और जग्गू जैसे कैरेक्टर यहीं मिलेंगे। चाहे जैसे उन्हें उलट-पलट कर देख लें। लोकथाओं का टाइप दरअसल चरित्र की सामाजिक खूबियों को सामने लाता था। पिछले दिनों कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण नहीं रहे। इस  प्रसंग में उनका जिक्र करना जरूरी है। उन्होंने रेखाचित्रों के जरिए जो चरित्र रचे वे राजकुमार हीरानी की फिल्मों जैसे ही थे। मसलन आरके लक्ष्मण के ‘बिना गांधी टोपी वाले नेहरू…’ ऐसे रेखाचित्र जो सरल हास्य के बीच सत्य के करीब ले जाते हैं। लक्ष्मण अपने कार्टूनों के जरिए विद्रूप नहीं रचे। उनके सरकारी बाबू, नेता, गृहणियां, पुलिसवाला सब जैसे हमारे आसपास के किरदारों में घुलमिल जाते थे। हर चरित्र अपने में एक छोटी सी कहानी छिपाए रहता है। हीरानी के चरित्र भी कुछ ऐसी ही सरल रेखाओं से बने हैं। यही कारण है कि हर उम्र और वर्ग के लोग इन चरित्रों से आसानी से जुड़ जाते हैं। अनोखे चरित्र बनाना आसान है, क्योंकि आपके जीवन और आसपास ऐसे बहुत से चरित्र टकराते रहते हैं मगर ‘स्टीरियोटाइप’ की रचना करना बेहद मुश्किल है। अपने सकारात्मकता में स्टीरियोटाइप दरअसल समाज के एक खास वर्ग के ‘सारतत्व’ को प्रस्तुत करते हैं। यही वजह है कि स्टीरियोटाइप की थ्योरी पश्चिमी नाट्यशास्त्र में ‘स्टॉक कैरेक्टर्स’ में बदल जाती है। इस फॉर्म का इस्तेमाल बर्तोल्त ब्रेख़्त और दारियो फो जैसे नाटककारों ने भी सामाजिक विसंगतियों और खास सामाजिक चरित्रों को सामने लाने के लिए किया।

थिएटर की खूबियों और संरचनात्मक ताने-बाने से बुनी शंभू मित्र और अमित मैत्र की ‘जागते रहो’ भी कुछ ऐसी ही फिल्म थी, जहां एक बड़ी बिल्डिंग में रहने वाले लोग सांकेतिक रूप से जैसे पूरे देश और तत्कालीन भारतीय समाज के प्रतिनिधि बन गए। यह रूपक सिनेमा की भाषा में इसलिए संभव हो सकता क्योंकि शंभू मित्र के पास इप्टा के अनुभवों से हासिल थिएटर का अनुशासन था। ‘पीके’ की जड़ों में भी कहीं न कहीं थिएटर मौजूद है। चाहे इस फिल्म के लेखक अभिजीत जोशी का यूके के तमाशा थिएटर कंपनी से जुड़ाव ही क्यों न हो। शायद यह कारण है कि ‘जागते रहो’ का वह देहाती अब एक एलियन बन गया है। मगर दोनों कहीं न कहीं हमारे जनमानस में बसे कबीर का रूपक बन जाते हैं। वही ठसक, अंदाजे-बयां और सामाजिक विसंगतियों को भेदने वाली सहज मगर पैनी नजर। ‘जागते रहो’ राजकपूर की महान फिल्मों में से एक है। एक स्तर पर यह फिल्म मौलियर के किसी हास्य नाटक की तरह चलती हुई खत्म हो जाती है। मगर गौर करने पर हास्य से पिरोई इस कथा में बहुतस्तरीय अर्थ छायाएं हैं। ‘पीके’ भी अपनी सहजता में इस अर्थ छायाओं को साथ लेकर चलती है। फिल्म में “आसमां पे है खुदा, और जमीं पे हम” गीत का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है।

इस फिल्म में अनुष्का के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी थी। आमिर जैसे अभिनेता के बरक्स उसे पूरी फिल्म के नैरेटर की भूमिका को निभाना था। कहानी तो जग्गू यानी अनुष्का कहती है और कहने वाला अगर ढीला-ढाला लगता तो शायद दर्शकों की सारी दिलचस्पी ही खत्म हो जाती। मगर अनुष्का गर्ल नेक्स्ट डोर बनी रहने के साथ ही पटकथा के संवेदनात्मक तंतुओं से जुड़ी रही हैं। वहीं आमिर ने विस्फारित नेत्रों से दुनिया को देखने वाले एलियन का न सिर्फ बेहद दिलचस्प किरदार जिया है बल्कि उसे एक गहराई भी दी है। आमिर मेथड एक्टिंग के करीब हैं और अपनी शारीरिक भाषा और किरदार को पर्दे पर पूरी तरह से जीने के लिए काफी मेहनत करते हैं। मगर यहां उनका पाला पड़ा एक काल्पनिक किरदार से। यह आमिर की खूबी है कि लेखन में पिरोए गए कुछ नए किस्म के मुहावरे जैसे ‘रांग कनेक्शन’ जुबान पर चढ़ जाते हैं।

हालांकि हीरानी को भी इसमें महारत हासिल है- तभी मुन्नाभाई, गांधीगिरी, ऑल इज वेल जैसे फ्रेज का वे न सिर्फ अविष्कार कर पाते हैं बल्कि उनकी सटीकता के जरिए पॉपुलर कल्चर में उसे लोकप्रिय भी बना देते हैं। बार-बार तुलना में लाई जाने वाली फिल्म ‘ओएमजी’ कहीं से कहीं तक ‘पीके’ के करीब नहीं बैठती। ‘ओएमजी’ ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करती हुई धार्मिक पाखंडो पर चोट करती है। मगर पीके इससे उलट सवाल करता है- “तुम एक छोटा सा गोला का छोटा सा शहर का छोटा सा गली मां बैठकर बोलता है कि ओकी रछा करेगा? जउन ई सारा जहान बनाया है!” ‘पीके’ वैचारिक तौर पर एक संशयवादी फिल्म है और इस संशयवाद का दामन हर जगह मजबूती से थामे रहती है मगर वहीं दूसरे स्तर पर उसकी इंसान की अच्छाइयों पर गहरी आस्था भी झलकती है। थोड़ा और गौर करें तो हीरानी की यह फिल्म एनॉलिटिकल भी है। पीके का हर कदम उसकी समझ में होने वाले किसी नए इजाफे से होता है। दिलचस्प बात यह है कि पीके को कुछ और समझ में आता है पर हमारे सामने कुछ और सत्य उद्घाटित होता है- जैसे कि वह कहता है कि धर्म एक फैशन है।

‘पीके’ की खूबी यह है कि वह कहानी कहने के लोकप्रिय तत्वों का सहारा लेते हुए बुराई को व्यक्ति केंद्रित बनाने की बजाय एक तंत्र के रूप में प्रस्तुत करती है और हमें उस तंत्र और विरोधाभासों के प्रति हमें सचेत करती है, जिनका जाल लुभावने शब्दों के जरिए बुना गया है। कबीर के शब्दों में कहें तो- माया महा ठगिनि हम जानी। तिरगुन फांसि लिये कर डोलै बोलै मधुरी बांनी।।

हैदरः हम हैं कि हम नहीं

झेलम झेलम ढूंढ़े किनारा/ डूबा सूरज किन आंखों में/ झेलम हुआ खारा/ किससे पूछें कितनी देर से/
दर्द को सहते जाना है/ अंधी रात का हाथ पकड़कर/ कब तक चलते जाना है

ग़ुलजार (फिल्म ‘हैदर’ के गीत से)

हैदर फिल्म पर बात इन्हीं पंक्तियों से शुरु होनी चाहिए। ये. पंक्तियां निर्देशक विशाल भारद्वाज के वास्तविक मंतव्य की ओर ले जाती हैं। यह फिल्म शेक्सपीयर के उदात्त नायकों और युगों की अनुगूंज अपने भीतर समेटने वाली मानवीय त्रासदी से गुजरते हुए असल में बहुत कोमल भाव के साथ समाप्त होती है। और अंत में जब फैज़ अहमद फ़ैज की एक नज़्म अंधेरे में लोरी बनकर गूंजती है और सिनेमाहॉल से निकलने के बाद बहुत देर तक पीछा करती है; तब एक भीषण रक्तपात में डूबा हुआ फिल्म का क्लाइमेक्स अंततः नज़्म की इन पंक्तियों पर हल्का होकर तैरने लगता है- “उन दुख़ी माँओं के नाम/ रात में जिन के बच्चे बिलख़ते हैं और/ नींद की मार खाए हुए बाज़ूओं से सँभलते नहीं/ दुख बताते नहीं/ मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं”।

हैदर एक सिंफनी रचती है। इसमें शेक्सपीयर हैं, विशाल भारद्वाज का रुह को छू लेने वाला संगीत है, फैज़ और गुलज़ार के याद रह जाने वाली रचनाएं हैं और विशाल भारद्वाज के अद्भुत संवाद हैं। तब्बू, केके, इरफान और शाहिद की अदायगी है। और इतिहास के त्रासद मज़ाक हैं। यही वह जगह है जहां विशाल इस फिल्म को बड़ा बनाते हैं। एक क्लासिक रचना पर आधारित यह फिल्म एब्सर्डिटी की हद तक जाने का खतरा उठाती हुई इतिहास के त्रासद मजाक पर टिप्पणी करती है। यह शेक्सपीयर से सैमुअल बैकेट तक का सफर है, मगर थोपा हुआ नहीं बल्कि भीतर कथा, किरदार और कैनवस में गुंथा हुआ। इस लिहाज से भारद्वाज की यह फिल्म अपने तेवर में आधुनिक या कहें तो उत्तर आधुनिक है।

फिल्म शेक्सपीयर के नाटक ‘हैमलेट’ को अपनी रचनात्मकता का आधार बनाती है। मूल कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। शेक्सपीयर हैमलेट में क्लाडियस अपने भाई यानी हैमलेट के पिता की हत्या करके डेनमार्क का राजा बनता है और हैमलेट की मां उसकी रानी। राजदरबार में मौत का शोक और शादी का उत्सव- दोनों साथ होते हैं। शेक्सपीयर का हैमलेट बेहद संवेदनशील और कुशाग्र बुद्धि वाला शख्स है। हैदर भी कविताएं लिखता है और फिल्म आगे बढ़ती है तो विक्षिप्तता में उसकी शायरी चाबुक की तरह लगती है। शेक्सपीयर का हैमलेट अपने आसपास की घटनाओं से बुरी तरह व्यथित है। क्लाडियस उसे समझाकर अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है। लेकिन हैमलेट को पिता की प्रेतात्मा बता देती है कि उसकी हत्या क्लाडियस ने ही की थी। हैमलेट का द्वंद्व और भी बढ़ जाता है। अब उसे अपने पिता की मौत का प्रतिशोध लेना है।

A scene from Vishal Bhardwaj movie Haider
नाटक का चरम शायद वह स्थल है जब राजतंत्र की निरंकुशता, मां की कमजोरियां और फरेब तथा पोलोनियस जैसे राज्याधिकारियों की सत्ता के प्रति अंधनिष्ठा- इन सबको देख कर प्रतिशोध की आग और आत्मघात की गहरी घुटन से भरा बेचैन हैमलेट पिता की हत्या के दृश्य को नाटक के रूप में पेश करके क्लाडियस को बेनकाब करता है। ‘हैदर’ में यह एक नृत्य-नाट्य प्रस्तुति के रूप में सामने आता है। हैदर बने शाहिद कपूर ने अपने आवेग भरे शारीरिक अभिनय से इन दृश्यों को यादगार बना दिया है। भारतीय फिल्मों में कथा के भीतर कथा के जरिए अतीत में हुए पापों को उजागर करने और प्रतिशोध का ऐलान करने का अंदाज बहुत लोकप्रिय रहा है। इसका सबसे लोकप्रिय उदाहरण फिल्म कर्ज के गीत “इक हसीना थी, इक दीवाना था…” के फिल्मांकन में देखा जा सकता है। पुराने दौर की बहुत सी हिन्दी फिल्मों में नायक के भीतर की घुटन और प्रतिशोध की भावना ही कथा के भीतर कथा का रूप ले लेती थी और उसे अक्सर मंच पर नाट्य रचनाओं की प्रस्तुति के रूप में दिखाया जाता था। यह फार्मुले में भले ही तब्दील हो गया हो उसकी जड़ों में हैमलेट का वह महान दृश्य है। ‘हैदर’ में यह घुटन तीव्र रूप इसलिए ले लेती है क्योंकि वह चरित्र अपने आसपास के राजनीतिक दबावों को भी समेटता हुआ चलता है।

भारतीय साहित्य पश्चिमी चरित्रों को किस तरह से स्वीकार या अस्वीकार करता है, इसका एक दिलचस्प उदाहरण हिंदी कवि रामधारी सिंह दिनकर के एक लेख में मिलता है। वे अपनी किताब कवि और कविता में लिखते हैं, “हैमलेट अनोखा हमें जितना भी लगे वह बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति नहीं है। प्राचीन काल में हैमलेट की कल्पना नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उस समय आदमी की जानकारी कम, मगर उसके मिजाज में स्थिरता अधिक थी। हैमलेट का असली समय वह है, जिसमें हम जी रहे हैं। ज्यों-ज्यों आदमी के ज्ञान में वृद्धि होती है, त्यों त्यों चिंतक वर्ग का बुरा हाल होता जाता है। यह युग उन मनीषियों का है जो फाउस्ट के सगोत्री होने के कारण मिट रहे हैं अथवा मिजाज से हैमलेट होने के कारण विनाश को प्राप्त हो रहे हैं; या तो उच्चाभिलाषाओं के कारण टूट रहे हैं या इस कारण बर्बाद हो रहे हैं कि जो बातें उनको पसंद नहीं है उनसे वे समझौता नहीं कर सकते।” हैदर भी हालात से समझौता नहीं करता।

विशाल भारद्वाज ने बड़ी सूझबूझ से हैमलेट की इस कहानी को भारतीय तानेबाने में बुना है। इसके लिए कश्मीर का चयन करना उनके रचनात्मक विवेक का उदाहरण है। हैमलेट और डा. फाउस्ट को आधुनिक पश्चिमी मानस का प्रतिनिधित्व माना जाता है। फाउस्ट जहां उच्च महत्वाकांक्षा का प्रतीक है, हैमलेट दुविधा का। हैमलेट जैसे ठेठ पश्चिमी किरदार को भारतीय परिवेश में प्रस्तुत करना एक मुश्किल काम था। मगर शाश्वत मानवीय स्थितियां देशकाल से परे होती हैं और कई बार सर्वथा भिन्न स्थितियों बेहद सटीक साबित होती हैं। जापानी निर्देशक अकीरा कुरोसावा ने अपनी फिल्मों में शेक्सपीयर और मैक्सिम गोर्की जैसे यूरोपीय लेखकों की रचनाओं को बिल्कुल भिन्न एशियाई परिवेश में प्रस्तुत किया और ये विश्व की महान फिल्मों में गिनी जाती है। ‘हैदर’ में कई बार लगता है कि हैदर के लिए कश्मीर का चयन नहीं बल्कि कश्मीर की विडंबना को दर्शाने के लिए हैमलेट का चयन किया गया है। फिल्म रिलीज होने से पहले भारद्वाज ने एक इंटरव्यू में कश्मीर की पृष्ठभूमि के चयन पर अपनी स्थिति साफ की थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें हैमलेट के लिए एक हिंसक राजनीतिक पृष्ठभूमि की जरूरत थी। उन्होंने यह भी कहा कि हमने मुख्य धारा के सिनेमा में अभी तक कश्मीर की स्थिति पर वास्तव में कोई फिल्म नहीं बनाई है। कश्मीर और हैमलेट जैसे विषय पर आधारित फिल्म बनाना मुश्किल है लेकिन मुझे उम्मीद है कि मैं ऐसा कर पाउंगा।

…और विशाल ऐसा कर पाए। स्याह स्क्रीन में उभरने वाले फिल्म के आरंभिक दृश्यों के जरिए ही विशाल अपने दर्शकों को नब्बे के दशक की कश्मीर घाटी में ले जाते हैं। जहां की हवाओं में बारूद की गंध फैली है और पढ़ाई के लिए अलीगढ़ भेजा गया हैदर वापस लौटा है अपने पिता की तलाश में। हैदर के डॉक्टर पिता (नरेंद्र झा) अचानक लापता हो जाते हैं। उसे सिर्फ इतना पता चलता है कि डॉक्टर को सुरक्षा एजेंसियों के अफसर जांच के लिए ले जाते है। शक है कि डॉक्टर घाटी में सक्रिय आतंकी संगठन के लिए काम करते हैं। इसके बाद हैदर के पिता अचानक गायब हो जाते हैं। पिता की तलाश कर रहे हैदर के सामने कई रहस्योद्घाटन होते हैं। दर-ब-दर भटकते हुए हैदर को पता चलता है उसके पिता की रहस्यमय मौत हो चुकी है।

यह बताने वाला रूहदार है, जो खुद एक रहस्यमय शख्स है। इन घटनाक्रमों के बीच हैदर की अम्मी गजाला बेगम (तब्बू) और उसके चाचा खुर्रम (केके मेनन) निकाह करने की तैयारी कर रहे हैं। अपने पिता के हत्यारों से बदला लेने की फिराक में लगे हैदर के शक की सुई खुर्रम और अपनी मां पर टिक जाती है। हैदर को यह समझ में नहीं आता कि वह किस पर यकीन करे। अपनी मां पर, अपनी प्रेमिका अर्शिया पर या रुहदार पर। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। मगर यह संतुलन बिगड़ना भी एक रचनात्मक ट्विस्ट है। मिशेल फुको जैसे उत्तर आधुनिकतावादी चिंतक मानते हैं कि जिन्हें पागल समझा जाता है हो सकता है कि वे संवेदना के स्तर पर बिल्कुल अलग जमीन पर खड़े हों और तथाकथित सामान्य लोग किसी सामूहिक विक्षिप्तता का शिकार हों। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है हैदर एक डिस्टॉर्टेड (विरूपित) कैरेक्टर बन जाता है। हैदर समझ जाता है कि वह कुछ कर नहीं सकता मगर व्यवस्था पर उसके हंसने की ताकत को कोई राज्यसत्ता नहीं छीन सकती। हैदर का परिहास या मज़ाक उड़ाना एक गहरी निराशा से निकलकर बाहर आता है। यही विशाल भारद्वाज का ‘हैमलेट’ है।

Haider Movie

हैदर के किरदार का यह ट्रांस्फार्मेशन स्तब्ध कर देता है। उसके इसी पागलपन के दौर में हैमलेट के ‘टू बी ऑर नॉट टू बी, दैट इज द क्वेश्चन’ को विशाल भारद्वाज ‘हम हैं कि हम नहीं’ के रूप में सामने लाते हैं। यह हैमलेट की दुविधा तो है ही, कश्मीर को उसकी एब्सर्डनेस के साथ सामने लाता है। “शक पे है यकीं तो/ यकीं पे है शक मुझे”। उसकी प्रेमिका अर्शिया पूछती है, “मतलब?” तो हैदर जबाव देता है, “रुहदार का अफसाना सच्चा/ या झूठी कहानी चचा की/ किसका झूठ झूठ है/ किसके सच में सच नहीं/ है कि है नहीं/ बस यही सवाल है/ और सवाल का जवाब भी सवाल है” अर्शिया फिर पूछती है, “क्या?” हैदर का जवाब है, “दिल की गर सुनूं तो है/ दिमाग की तो है नहीं/ जान लूं कि जान दूं/ मैं रहूं कि मैं नहीं”।

विशाल की रचनात्मक सूझबूझ का एक और उदाहरण रूहदार (इरफान खान) का किरदार है, जो खास इस फिल्म के लिए ही रचा गया है। रूहदार ही हैदर को पिता की हत्या के बारे में बताता है, जबकि नाटक में हैमलेट की पिता की प्रेतात्मा रहस्योद्घाटन करती है। मूल नाटक की तरह यहां भी हैदर यानी हैमलेट क्लाडियस यानी खुर्रम (केक मेनन) को मार डालने की फिराक में घूम रहा है और क्लाडियस हैमलेट को। शेक्सपीयर के हैमलेट में मौका पाकर भी अपने संस्कारों के कारण हैमलेट प्रार्थना कर रहे क्लाडियस को मार कर स्वर्ग में नहीं भेजना चाहता है। फिल्म में यही स्थिति खुर्रम और हैदर के बीच उपस्थित है। हैदर और उसकी मां के बीच रिश्ते भी काफी जटिल हैं। हालांकि हैदर का ओडिपस कांप्लेक्स वास्तविक नहीं लगता, कम से कम सामान्य स्थितियों में यह उतना मुखर नहीं होता जैसा कि फिल्म दिखाने का प्रयास करती है।

नाटक के अंत में पोलोनियस के बेटे लेयर्टीज के साथ तलवारबाजी में जहर बुझी तलवार और जहरीली शराब से क्लाडियस, रानी, हैमलेट सब मारे जाते हैं। पीछे छूट जाता हैं- लाशों का ढेर और उनकी कहानियां। मरते वक्त भी अविश्वास से भरा हुआ हैमलेट होरेशियो से फरियाद करता है- ‘अगर तूने कभी मुझे अपने दिल में जगह दी हो तो छोड़ दे अपनी खुशी थोड़ी देर के लिए और इस जालिम दुनिया में अपने दर्द की सांसें गिनते हुए मेरी कहानी कहने के लिए जिंदा रह!’

हैदर एक राजनीतिक फिल्म नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील फिल्म है। यह चेक लेखक मिलान कुंदेरा के उपन्यास ‘द जोक’ या जार्ज आरवेल के ‘1984’ की तरह निजी जीवन में राजनीतिक की पर्तों को उद्घाटित करती है। कई दृश्यों में यह फिल्म एक कॉमिकल प्रहसन का भी सृजन करती है। जैसे चौक पर भीड़ को संबोधित करता सनक गया हैदर, या कब्र खोदते वक्त गीत गाते बूढ़े। सलमान और सलमान (फिल्म के दो हास्य चरित्र जो मुखबिर का काम करते हैं) के किरदार को प्रस्तुत करने में विशाल लगभग हॉलीवुड के अंतोनियो तारंतोनी की तरह हास्य और हिंसा के मेल को तटस्थ रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस फिल्म पर विवाद हुए। खास तौर पर फिल्म की रिलीज के बाद ही सोशल मीडिया पर फिल्म पर काफी चर्चा हुई।

इस फ़िल्म को लेकर ट्विटर पर दो समूह बन गए, एक समर्थकों का और एक विरोधियों का। दोनों समूह अपने-अपने हैशटैग प्रयोग कर रहे थे। फ़िल्म की आलोचना करने वालों ने रिलीज होने के कुछ ही दिनों के भीतर #BoycottHaider (हैदर का विरोध करो) हैशटैग से 75 हज़ार से ज़्यादा ट्वीट किए। विरोध में एक दूसरा समूह खड़ा हुआ जिसने हैदर को एक सच्ची अभिव्यक्ति माना है। इस समूह ने उसी दौरान #HaiderTrueCinema (हैदर वास्तविक सिनेमा) हैशटैग से 45 हज़ार से ज़्यादा ट्वीट किए थे। मगर यह फिल्म हमारे भारतीय समाज के विमर्श को एक कदम आगे ले जाती है जहां हम संवेदनशील विषयों के प्रति अधिक उदार हो रहे हैं। बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में दी इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स’ के विश्लेषक डॉ.ज़ाकिर हुसैन ने इस बहस को सकारात्मक रूप में लेते हुए कहा, “भारत की लोकतांत्रिक परंपरा जितनी मजबूत होगी ऐसी फ़िल्में उतनी ही ज़्यादा बनेंगी और लोग शिक्षित होंगे। ‘हैदर’ इस दिशा में पहला क़दम है।”

कुल मिलाकर ‘हैदर’ बहस की ओर खींचती तो है। वह बहुत सारे परेशान करने वाले सवालों से घेरती भी है। बकौल हैदर- “सवाल का जवाब भी सवाल है….”। वह हमारे भीतर मौजूद हैमलेट को टटोलती है।

अग्लीः यथार्थ हमेशा बदसूरत नहीं होता अनुराग!

शायद अब अनुराग कश्यप को यह समझने की जरूरत है कि हर यथार्थवादी फिल्म का डार्क होना जरूरी नहीं है और यह भी कि जिंदगी की हकीकत का मतलब सिर्फ कड़वाहट नहीं है। यह भी कि वास्तविकता के करीब लगने वाला हर चरित्र हमेशा इतना बदसूरत नहीं होता जितना कि वे अपनी फिल्मों में दिखाते हैं। अनुराग की खास शैली जो उन्हें मौलिक बनाती थी, अब दुहराव का शिकार होती लगी है। ‘अग्ली’ तकनीकी तौर पर पिछली फिल्मों से ज्यादा बेहतर होते हुए भी अनुराग के कुछ इन्हीं आग्रहों की वजह से एक बड़ी फिल्म नहीं बन पाती।

‘‘अग्ली’’ एक थ्रिलर है। इसका थ्रिलर होना एक बहुत बड़ी संभावना थी, मगर अनुराग इन संभावनाओं को विस्तार नहीं दे पाए। थ्रिलर के फारमेट में कई अद्भुत फिल्में बनी हैं। क्लाइमेक्स से थोड़ा पहले तक ‘अग्ली’ भी बेहद संभावनाशील फिल्म लगती है। पटकथा बेहद कसी हुई है और संपादन चुस्त। अनुराग पूरी फिल्म में आपको बांधे रखते हैं। तेज घटनाक्रम, विश्वसनीय चरित्र, अनूठी लोकेशन और नई धारा के निर्देशक क्वेंटिन तारंतोनी की तरह डार्क ह्ययूर और विडंबनापूर्ण स्थितियां। सब कुछ यहां पर है। आप एक बड़े सत्य के उद्घाटित होने की उम्मीद करने लगते हैं। आपको लगता है कि आप दरअसल जो देख रहे हैं वह तो सिर्फ एक सतह है, फिल्म की गहराई तो अभी उद्घाटित होनी है। लेकिन निराशा तब होती है कि जब यह तेज रफ्तार रोलर कोस्टर आपको कहीं ले नहीं जाता, बल्कि वापस उसी जगह छोड़ जाता है, जहां से आप चले थे। एक महान फिल्म आपको यथार्थ के परे ले जाती है।

अगर इस लिहाज से देखें तो अनुराग अपनी ही एक बेहतरीन फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ के मुकाबले कमजोर पड़ जाते हैं। ‘अग्ली’ और ‘ब्लैक फ्राइडे’ की तुलना कई लिहाज से दिलचस्प होगी। दोनों ही तेज रफ्तार थ्रिलर हैं। दोनों में विषय वस्तु का ट्रीटमेंट अद्भुत और यथार्थ के बहुत करीब है, मगर ‘ब्लैक फ्राइडे’ अपनी तटस्थता में भी एक बड़ी फिल्म इसलिए बन जाती है कि बह दर्शक को घटनाओं के सिलसिले से ऊपर ले जाती है, जहां वह ब्योरों को एक तटस्थ नजरिए से देख पाता है। यह अनुराग के ट्रीटमेंट का कमाल था, नहीं तो ‘ब्लैक फ्राइडे’ सिर्फ मुंबई बम ब्लास्ट से जुड़ी घटनाओं का एक दस्तावेजीकरण बनकर रह जाती। मगर फिल्म एक डाक्यूफिक्शन की तरह आगे बढ़ती हुई यह बताती है कि यथार्थ इकहरा नहीं होता और करीब से की गई पड़ताल में बेहद जटिल हो सकता है।

जटिल यथार्थ को प्रस्तुत करना ही अनुराग कश्यप की सबसे बड़ी खूबी रही है। ‘अग्ली’ इसीलिए ज्यादा उम्मीदें जगाती है। यह एक अपहरण की कहानी है। कली (अनिशिका श्रीवास्तव) नाम की एक बच्ची को कोई किडनैप कर लेता है। कली एक डिस्टर्ब फैमिली में पल-बढ़ रही बच्ची है। कली की मां शालिनी (तेजस्विनी कोल्हापुरे) उसके पिता राहुल (राहुल भट्ट) से अलग हो गई हैं। जो कि फिल्मों में संघर्ष कर रहा एक असफल अभिनेता है। कली का सौतेला पिता शौमिक (रोनित रॉय) एक पुलिस अफसर है। तीनों ही कली को तलाश रहे हैं। मां और पिता फिरौती देने की कोशिश में हैं तो शौमिक पुलिस तंत्र का सहारा लेता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है लोगों के और दूसरे शब्दों को कहें तो हमारी सोसाइटी के कुरूप चेहरे सामने आने लगते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अपहरण या किसी किरदार के गुम हो जाने की कहानियां सिनेमा में अक्सर कही गई हैं, और एक शख्स के अचानक गुम हो जाने के बाद चरित्रों के बदलते आपसी समीकरण ज्यादातर फिल्मकारों की दिलचस्पी का विषय रहे हैं। इस लिहाज से सबसे उत्कृष्ट फिल्म अकीरा कुरोसावा की ‘हाई एंड लो’ कही जा सकती है। जहां एक घरेलू नौकर के बच्चे का अपहरण कई नैतिक प्रश्न खड़े कर देता है। इसी कथा को आधार बनाकर भारत में सन 1978 में ‘इनकार’ नाम की फिल्म भी बनी थी। बांग्ला लेखक रमापद चौधरी के उपन्यास बीज पर बनी मृणाल सेन की फिल्म एक दिन अचानक में भी घर से एक बुढ़ा शख्स अचानक चला जता है और चीजों के परिप्रेक्ष्य बदलने लगते हैं। शब्द कुमार की लिखी और राज बब्बर अभिनीत एक कम चर्चित मगर उत्कृष्ट फिल्म ‘जवाब’ का नायक भी लगातार धमकियों से तंग आकर खलनायक की बेटी को ही किडनैप कर लेता है। यहां तक कि मारक्वेज ने भी अपहरण की वास्तविक घटना को आधार बनाकर ‘न्यूज आफ ए किडनैपिंग’ उपन्यास लिखा था।

यहां कुरोसावा की फिल्म का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। दोनों फिल्मों में एक स्तर पर साम्यता है। दोनों फिल्मों का ड्रामा अपहरण के बाद के घटनाक्रम को आधार बनाता है। दोनों ही फिल्में अपहरण की घटना के बहाने चरित्रों और स्थितियों को पर्त-दर-पर्त उद्घाटित करती जाती हैं। कुरोसावा ने इस फिल्म के लिए अमेरिकी लेखक एड मैक्बेन के क्राइम नावेल ‘किंग्स रैनसम’ को आधार बनाया था। मगर उन्होंने उपन्यास के कथानक को इस तरह से प्रस्तुत किया कि यह तत्कालीन जापानी समाज का एक आइना बन गया। कारोबारी दुनिया में अपने अस्तित्व के संघर्ष के जूझते हुए एक व्यवसायी के बेटे का कुछ अपराधी अपहरण करना चाहते हैं, मगर वे उसके बेटे की जगह उसके शोफर के बेटे को उठा ले जाते हैं, जो उसके बेटे का दोस्त भी है। व्यावसायी फिरौती देने से इनकार कर देता है मगर उस पर लगातार फिरौती का दबाव बना रहता है। उसके सामने मीडिया, अपनी पत्नी और बेटा और खुद की नैतिकता खड़ी है। यहां आकर क्राइम थ्रिलर एक इंसानी दुविधा एक नैतिक प्रश्न में बदल जाता है।

‘अग्ली’ के साथ दिक्कत यही है कि यह किसी तरह के सवाल नहीं खड़े करती बल्कि स्थितियों को जस का तस रखने की कोशिश करती है। हमने अपहरण आधारित जितनी फिल्मों को याद कर पाए वहां पर अपह्रत चरित्र बेहद महत्वपूर्ण और केंद्रीय था। मगर ‘अग्ली’ में सिवाय इसके कि कली का नाम बार-बार हर चरित्र लेता रहता है, उसे कोई खास महत्व देने की कोशिश नहीं की गई है। अनुराग की फिल्मों में आश्चर्यजनक रूप से बच्चे और बुजुर्ग गायब हैं। वे हाशिये पर भी नहीं हैं। कली के साथ भी यही हुआ है। नतीजा यह होता है कि यह स्पष्ट नहीं होता कि वो कौन सी कसक है जिसे अपने मन में लिए शौमिक अपनी सौतेली बेटी को तलाशता फिर रहा है, जिसकी मां और पिता दोनों से वह नफरत करता है।

इस लिहाज से यह सामान्य लोगों की फिल्म नहीं है। तटस्थ ट्रीटमेंट देने की इस कोशिश में मूल घटना की इंटेसिटी कम हो जाती है। कहानी किरदारों के इर्द-गिर्द भटकने लगती है। मगर किरदारों के साथ भी दिक्कत है। अनुराग की पिछली फिल्मों की तरह यहां भी वैसे ही ग्रे शेड वाले चरित्र हैं। स्क्रीन पर वे बेहद विश्वसनीय लगते हैं। उनकी अदायगी, गेटअप और सिचुएशन के मुताबिक प्रतिक्रियाएं उन्हें हकीकत के काफी करीब लाकर बैठाती हैं। मगर उनकी आंतरिक बुनावट में गड़बड़ है। फिल्म यह नहीं बता पाती की वास्तविकता के इतने करीब लगने वाले ये किरदार ऐसे क्यों हैं जैसे कि वे दिखते हैं। शालिनी किस किस्म की स्त्री है जिसकी भावनात्मक डोर किसी से बंधी हुई नहीं मगर फिर भी वह प्रताड़ित, त्रस्त और अवसादग्रस्त नजर आती है। शौमिक ने अगर शालिनी को अपनाया है तो फिर वह उसे किस बात की सजा दे रहा है, और उसके साथ बुरा बर्ताव करता है। शालिनी के मन में भी अपनी बेटी के प्रति ऐसा कोई अनुराग नहीं है जैसा कि मां से अपेक्षित है।

हालांकि इन्हीं किरदारों की मदद से कुछ अद्भुत दृश्य रचे गए हैं। शालिनी के भाई का नोटों के साथ डांस करना। राहुल की ज्वेलरी की दुकान को लूटने की कोशिश और फ्लैशबैक के एक टुकड़ा जब शालिनी अपनी बेटी को दूध में नींद की गोलियां दे रही होती है। नोटों के साथ डांस के दृश्य में क्वैंटिन तोरंतोनी याद आते हैं तो तेजस्विनी को देखकर बरबस इंग्मार बर्गमैन की फिल्म ‘समर विद मोनिका’ मन में कौंध जाती है। हालांकि ‘अग्ली’ उस फिल्म की कविता तक पहुंचना तो दूर उसके आसपास भी नहीं फटकती। वास्तविकता से कतराने वाली बर्गमैन की नायिका को न अपनी बच्ची में दिलचस्पी है न परिवार में। एक दिन वह बार में अपने पुराने प्रेमी के पास लौट जाती है। यहां हमें सिने इतिहास के कुछ सबसे शानदार शॉट्स में से एक मोनिका का लंबा क्लोज-अप देखने को मिलता है। उसकी निगाहें सीधे कैमरे की तरफ हैं यानी निगाहें सक्रीन को बेधती हुई सीधे दर्शकों से मुखातिब हैं और गोदार के शब्दों में उन आंखों में ‘अनिश्चय के बादल’ मंडरा रहे हैं।

बतौर निर्देशक और पटकथा लेखक अनुराग अपने चरित्रों से एक आब्जेक्टिव दूरी बनाकर चलना चाहते हैं। लेकिन यह चरित्रों को गहरा बनाने की जगह उन्हें उथला बना देता है। नतीजा यह होता है कि दर्शक उन किरदारों से जुड़ नहीं पाता और उन्हें उसी तरह देखता है जैसे हम सड़क चलते कुछ लोगों को देखते हैं, कई बार चकित होते हैं और कई बार भावुक और आगे बढ़ जाते हैं। फिल्म का छायांकन बेहतर है और संपादन बेहद शानदार। जीवी प्रकाश राव का संगीत अलग होने के साथ फिल्म के मूड से मेल खाता हुआ है। अनुराग के लिए यह फिल्म शायद एक टर्निंग प्वाइंट है। बतौर निर्देशक उनकी रेंज जबरदस्त है मगर उन्हें दुहराव से बचना होगा और नई चुनौतियों को स्वीकार करना होगा। और सबसे अहम बात यह समझनी होगी कि जिंदगी के यथार्थ का मतलब हमेशा और बेवजह की तल्खी नहीं होती।

उद्भावना’ में प्रकाशित