उड़नखटोला

पिछले कुछ दिनों से वह ठीक से सो नहीं पा रहा था। यह एक समस्या बनती जा रही थी। वह नींद के प्रति सचेत होने लगा था। यह अक्सर बचपन में बुखार के दौरान आई अधपकी नींद जैसा होता था। जब बदन की तपन बंद आंखों के भीतर तैरते चकत्तों को आहिस्ता-आहिस्ता डुलाती रहती थी।

उस नींद की तरह- जब पसीने से भीगे बदन और गर्म सांसों से रात को इंच-दर-इंच नापना पड़ता था। जब जिद्दी प्रेत की तरह कोई एक घटना या वाक्य सपनों से चिपका रहता था। सपने हवास पर गर्म राख की तरह फैले होते थे और हर करवट पर दिमाग चकरघिन्नी की तरह दिन भर की तस्वीरें उलटता-पलटता रहता।

हां, बचपन में इसी तरह सपने साथ-साथ चला करते थे। उसके लिए याद कर पाना काफी मुश्किल था कि जीवन की सबसे पहली स्मृतियां नींद का हिस्सा थीं या असल जिंदगी का।

मैं शायद पांचछह बरस का था। एक ठिठुरती सुबह मैंने खिड़की से बाहर झांका। हर तरफ सफेदी फैली थी। कई सालों बाद मौसम ने ऐसी करवट बदली थी। रोशनदान और ईंटों के बीच खाली गर्म जगहों में कबूतर ऊंध रहे थे। उन दिनों आंगन में रखी अंगीठी में कोयला सुलगता रहता था। अक्सर एक रॉडार की शक्ल का रूम हीटर बंद कमरे के नीमअंधेरे में नारंगी रोशनी बिखेरता रहता। घर में पड़ी सोवियत रूस के चिकने पन्नों वाली पत्रिका में खरगोश और भेड़िया भी बाहर फैले सफेद कुहरे जैसी बर्फ पर फिसलते नजर आते। मैं एक डगमगाती साइकिल के आगे बैठा गीली सलेटी सड़क पर आगे बढ़ता जाता। मुझे हर तरफ सफेद धुंध नज़र आतीजो आगे बढ़ने के साथ और गहरी होती जाती। इस अनजान मंजिल की तरफ बढ़ते जाना जैसे मेरी नियति बन जाती थी।

उन दिनों वह अक्सर धुंध से होकर गुज़रने का यह सपना देखा करता था। इस सपने से वह खुद को इतना आत्मसात कर चुका था कि सुबह-सुबह की ठंडी बयार और सूरज उगने से पहले पश्चिम में छाया सुरमई अंधेरा भी उसे किसी स्वप्न जैसे ही लगते थे। आंखें मलते, खाली मैदान में दौड़ती गायों और उनके कदमों से क्षितिज में उठती धूल देखकर वह चकित हो जाता था। वह दौड़कर मां के करीब पहुंचता और उनसे पूछता था, “आखिर यह दुनिया कितनी बड़ी है… क्या इसका कोई अंत भी है?”

जीवन की उन पहली स्मृतियों की तरह पहले-पहल देखे गए सपनों की यादें भी उसके मन के अंधेरे कोने में बसती चली गईं। वह अपनी बचपन की नींद को कभी भी याद कर सकता था। तीन-चार बरस उम्र से ही रोशनदान से छनती चांदनी, कमरे के मुलायम अंधेरे में मां के बदन से आती महक और पिता के हाथों का स्पर्श उसकी नींद का हिस्सा बन चुके थे।

रात को खाने के बाद मां से बातें करते हुए उसके पिता अपनी उंगलियों से उसका माथा सहलाते रहते। उनकी उंगलियों में एक महीन सा खुरदरापन था। जैसे किसी पुराने वृक्ष के तने में होता है। उस स्पर्श के साथ जब वह आंखें बंद करता तो बंद पलकों के आगे महीन पीली रोशनी से बना जाल तैरने लगता। कुछ ही पलों में तेजी से भागता वह रोशनी का पैटर्न बैगनीं-नीले फूलों में बदल जाता था। उसका पलंग जैसे एक उड़नखटोले में बदल जाता था। पलंग आहिस्ता-आहिस्ता उपर उठने लगता। सितारों भरे आसमान में एक डगमगाती सी छलांग के साथ ही वह अपनी चेतना खो बैठता।

चेतना खो बैठना… उसके लिए नींद का सबसे बड़ा जादू यही था। हर सोलह-सत्रह घंटे बाद मौत की दहलीज तक जाकर उल्टे कदमों से लौट आना। हर वापसी के बाद जिंदगी को नए सिरे से जीना… यह बचपन में ही संभव होता है। बड़े होने के बाद वह अक्सर सोचता था कि शायद जानवर और परिंदे ही हर रोज जगने के बाद एक नया जीवन जीते हैं। उम्र का एक हिस्सा रात को उनके सोने के साथ ही खत्म हो जाता है, अगली सुबह नींद खुलने पर वे एक नए जीवन को दस्तक देते हैं।

हां, बचपन के दिन अब स्वप्न जैसे लगते हैं। रात में मेले की परछाइयां, बादलों में कौंधती बिजली, झूले का ऊपर-नीचे होना, पानी की बाल्टी में डोलता सूरज का प्रतिबिंब, चमकीली धूप में हवा से फरफराती रंगीन फिरकियां… धूप-छांह-धूप… फिर सपना… अक्सर जमे हुए खून के कत्थई थक्के उसे आधी रात की नींद से जगा देते थे।

तुम जब हड़बड़ाकर उठते तो खिड़की के बाहर झरती चांदनी और मां और पिता की सांसों की आवाज भर सुनाई देती। दोबारा सोने की कोशिश करने पर आंखों के आगे वह नन्हा परिंदा फड़फड़ाने लगता जो उस दिन भी उड़ने की कई असफल कोशिशों के बाद सीढ़ियों पर सिमटा बैठा था। शायद घोसले से नीचे गिर गया था। हाथ बढ़ाकर उस भूरेकत्थई परिंदे को वहां से हटाना चाहा था तो हथेली को सिर्फ पक्षी की धड़कन, नुकीले पंजे और पंखों की फड़फड़ाहट से उपजा प्रतिरोध ही हासिल हुआ। तुम चुपचाप घर लौट गए थे। तुमने सोचा कि घर पर यह बात कहो मगर किसी अनजान सी शर्मिंदगी के चलते चुप रहे। दोपहर में जब तुम दोबारा उन सीढ़ियों से उतरे तो चिड़िया का वह नन्हा बच्चा मृत पड़ा था। उसके शरीर से बहा रक्त एक वृत की शक्ल में जमकर कत्थई सा हो गया था। चींटियों की एक कतार उसके शरीर की तरफ जा रही थी। वह अनजाने में किसी के भारीभरकम जूते से कुचल गया था।

उस घटना के बाद वह कई दिनों तक उदास रहा। शायद वह नन्हा परिंदा किसी बड़े शख्स के भारी-भरकम जूते से सीढ़ियां उतरते वक्त कुचल गया था। कई महीनों तक वह खुद को इस अपराध के लिए गुनहगार मानता रहा। यह सोचकर कि परिंदा बच सकता था, उसके भीतर से एक तकलीफ सी उमड़ने लगती। यह एक बेतुकी मौत थी। रक्त का कत्थई धब्बा कई दिनों तक बचपन के सपनों में तैरता रहा।

वह थोड़ा बड़ा हुआ तो रात से उसकी दोस्ती गहराने लगी। दिन और रात किसी अनजान कहानी के छोटे-छोटे अध्याय में बदल गए। रात होती थी तो दुनिया बदल जाती थी। लोग बदल जाते। यहां तक कि खुद की परछाईं भी उसे बदली-बदली सी नजर आती थी। पेड़ों की पत्तियों से गुजरती हवा की सरसराहट का रात में अलग ही रंग होता था। तब कई बार उसे लगता था कि रात के अंधेरे में चमकती चांदनी के पीछे कोई राज छिपा है। उन परछाइयों और रोशनियों के बीच कुछ ऐसा था जो मेरे भीतर आकार ले रही स्मृतियों की श्रृंखला से बहुत पहले का कोई अनजाना सच सिर्फ और सिर्फ मुझसे साझा करना चाहता था। मेरे मन में कुछ उमड़नेघुमड़ने सा लगता और मैं चुपचाप अपनी मां के बगल में जाकर बैठ जाता।

***

 

मां की बगल में न जाने कब उग आया यह मौन अकेलापन धीरे से उसके बचपन में दाखिल हो गया। देखते-देखते मां के सुंदर चेहरे पर टिकी रहने वाली बिंदी- जिसे वह अक्सर उनके माथे से उतारकर खेलता था- गायब हो गई और कनपटियों पर जाने कब आहिस्ता-आहिस्ता सफेदी उतर आई। शाम को आठ बजे दरवाजे पर दस्तक नहीं होती थी और न किसी पुरुष की गरमाहट भरी मौजूदगी उन दोनों की आंखों में चमक बनकर उतरती।

हां, शाम को आठ बजे के बाद मेरा दिल डूबने लगता। मां मुझे गोद में उठाए अक्सर डाक्टर के पास भागती। एक वर्ष तक यह सिलसिला चलता रहा। फेफड़ों में सांस समा पाने से हो रही उफनाहट, अंधेरे के साथ हर तरफ फैलती उदासी की छाया, मां का आंखों में चिंता लिए सपाट चेहरा, टेबल पर नजर आने वाला थर्मामीटर, पेन स्टैंड, पेपरवेट और शीशियों टेबलेट से भरी एक लोहे की अलमारी। एक बरस। आखिर मैंने अपने अवसाद से दोस्ती कर ली। आठ बजे तक मां काम खत्म करके कमरे की बत्तियां बुझाकर उसके बगल में लेट जाती। हम या तो आपस में बातें करते या रेडियो से उठती धुनों को सुनते।

रात के अंधेरे में उठती कुछ धुनें अपने साथ फिर वही पुराना अवसाद लपेटे आती थीं। क्योंकि उन धुनों के आगे-पीछे किसी के कदमों की आहट थी। साथ में थी अख़बार में लिपटी तली मछलियां और चेहरे पर उंगलियों की खुरदरी सी छुअन। उस धुन को सुनते ही उसे लगता उसके जीवन से कुछ छिनने जा रहा है। उसका दिल डूबने लगता था। कमरे की अंधेरी परछाइयां और गहरी हो जाती थीं। लगता था कि सांस फेफड़ों में समाने की बजाय वापस लौट जा रही है। मगर अपनी इस घबराहट को वह राज रखता। आखिर इतना समझदार हो गया था कि अपनी मां से वह बहुत कुछ छिपा सके- जिसके कारण उन्हें तकलीफ पहुंचती थी। मां-बेटे किसी अनकहे समझौते के चलते अपने अनिश्चित भविष्य के बारे में बातें नहीं करते थे। वे किसी अनकहे समझौते के चलते पिता के बारे में भी बात नहीं करते थे।

तुमने पिता को आखिरी बार देखा था तो लगा था कि वे सो रहे हैं। सिर्फ उनके होठों के कोने से बही एक खून की लकीरजो सूखकर लगभग काली सी नजर रही थीउनके चेहरे को कुछ अजीबसा बना रही थी।

पिता की मौत उतनी ही बेतुकी थी जितना परिंदे का जूते से कुचला जाना। उन्हें एक जीप ने टक्कर मार दी थी। उनका चश्मा और हाथ में तली हुई मछलियों का पैकेट छिटकर कर दूर जा गिरा था। लोग बताते हैं कि जीप चलाने वाले की कोई खास गलती नहीं थी। वह अभी गाड़ी चलाना सीख रहा था। सामने से आ रही ट्रक देखकर वह हड़बड़ा गया, इसी हड़बड़ाहट में उसका पांव ब्रेक की जगह एक्सीलेटर पर चला गया। उसी रोड पर एक सुरक्षित किनारे उसके पिता तली हुई सोंधी खुशबू वाली मछलियां लेकर घर जा रहे थे। वह अपने समय से एक घंटे लेट आ रहे थे। क्योंकि उसकी जिद पर वे उस दिन रास्ता बदलकर मछली खरीदने चौक की तरफ चले गए थे। जब जीप लहराती हुई फुटपाथ और किनारे की दीवारों को रगड़ती हुई पोल से जा टकराई तो पिता का उसी वक्त, उसी जगह पर होना कतई जरूरी नहीं था।

वह तब उम्र में छोटा और नासमझ था। इतना ज्यादा नासमझ कि जिस दिन पिता को घाट पर जलती लकड़ियों के हवाले किया गया तो लौटते वक्त वह किसी की बात पर मुसकराने भी लगा था। दरअसल चिता से लपटें उठनी शुरु हुईं तभी उसका मन हल्का हो गया था। उस दिन बेहद सुंदर बयार चल रही थी। घाट पर आबनूस जैसा काला व्यक्ति ढेर सारी कागज की रंग-बिरंगी फिरकियां लिए घूम रहा था। जो तेज हवा में फरफरा रही थीं।

बाद में अपनी इस नासमझी पर वह काफी शर्मिंदा भी हुआ। इसका अफसोस उसे बहुत दिनों तक रहा। खुद को शर्मिंदा करने के लिए वह एक बंद कमरे में खूब फूट-फूटकर रोया भी। शुरु के कुछ महीनों तक पिता की गैरमौजूदगी का एहसास उसे शाम को आठ बजे के आसपास होता था। यह उनके घर आने का वक्त था। उसका जी घबराने लगता था और वह चादर से मुंह ढककर सोने की कोशिश करने लगता। चेहरे पर लिपटा अंधेरा एक दरवाजा था- दूसरी दुनिया में कदम रखने का।

यहीं मैंने नींद से दोस्ती कर ली। यह एक आसान रास्ता था। बेहतर विकल्प। मैंने सपनों को टोहना शुरु कर दिया। जिंदगी समझ से बाहर, अनिश्चय से भरी और डरावनी थी। जबकि जीवन का हर सुखद टुकड़ा एक स्वप्न था। हर स्मृति एक स्वप्न थी। हंसी एक स्वप्न थी। ये नींद के स्याह सागर में तैरती उम्मीदें थीं। मैं सपनों के पीछे किसी शिकारी की तरह लग गया। नींद के अंधेरे जंगल में स्वर्ण मृग जैसे स्वप्न चमकते और गायब हो जाते। जितना ही उनके करीब जाने की कोशिश करो उतना ही उन्हें पकड़ पाना कठिन होता जाता था।

वहीं उसकी वास्तविक दुनिया में अनिश्चितता बढ़ती जा रही थी। पिता की मौत के बाद वह अपनी मां के साथ छिटक कर जैसे वक्त के हाशिए पर चला गया था। घर के पुराने साल-दर-साल बदरंग हो रहे दरवाजे के पीछे घड़ी की सुइयां ठहर गई थीं। उस दरवाजे के पीछे कुछ घटित नहीं हो रहा था। सिवाय इसके कि मां वक्त बीतने के साथ बूढ़ी और एकाकी होती जा रही थीं। उनके सुंदर चेहरे पर झुर्रियां नज़र आने लगी थीं। मां के पास एक लकड़ी की बनी सुंदर सी संदूकची थी। वे उसे कलमदान बोलती थीं। उसके भीतर कई खांचे बने हुए थे। उसमें वह अपनी पुरानी डायरी, पेन और खत रखती थीं। अपनी डायरी वे उस देखने नहीं देती थीं। हालांकि वह जानता था कि मां ने उसमें दूसरी किताबों में पसंद आने वाले शे’र और कविताएँ लिख रखी हैं। कई बार वे खुद भी कुछ लिखने की कोशिश करती थीं, मगर बाद में संतुष्ट न होने पर या तो अपनी पंक्तियां काट देती थीं या वह पृष्ठ ही फाड़ देतीं। पीले पड़ गए कागजों और पुराने टाइप के अंतर्देशीय में किसके खत थे, जिन्हें वो अकेले में पढ़ती थीं- यह उसके लिए एक रहस्य था।

हर बारिश के बाद घर की छतों पर और ज्यादा पपड़ियां जमने लगी थीं और दीवारों पर उगी काई का रंग और गहरा होता जाता था। घर के पिछले हिस्से में आंगन की बिना पलस्तर वाली दीवार में एक दरार पड़ गई थी। वक्त बीतने के साथ मां बेटे के बीच संवाद कम होता जा रहा था। वे अदृश्य गलियारों में अलग-अलग एक-दूसरे की विपरीत दिशा में चल रहे थे।

अनिश्चय एक बाघ बनकर तुम्हारी नींद में दाखिल होता था। अपनी आंखों में एक निर्विकार हिंसा लिए। टूटे हुए खंडहरों या खाली फैली छतों पर टहलता। तुम जंगले से उसे देखते और दरवाजे बंद करना शुरू कर देते थे। वह एक निश्चिंतता लिए खुली छत पर लोटता रहता। उसके गले से निकलती खिलंदड़ी गुर्राहट कमरे के भीतर सुनाई देती रहती। तुम भयभीत खिड़कियों से झांकते रहतेउसके पूरी तरह चले जाने की प्रतीक्षा में।

हर बारिश में दीवार की दरार और बढ़ जाती थी। वह कई बार उत्सुकता से दरार के भीतर झांकता था। दरार के भीतर उसे एक पूरी दुनिया नजर आती थी। वहां हरी काई का जंगल उग आया था। गर्मियों में चमकीले कत्थई कैटरपिलर के झुंड उसके भीतर अलसाये भाव से रेंगते नजर आते। कभी कपास का नन्हा सा फूल उस दरार में जाकर अटक जाता तो कभी चींटिंयों का झुंड मार्च करता हुआ वहां से गुजरता था। सर्दियों में छिपकलियां उस दरार के भीतर गहन निद्रा में सोती दिखाई देती थीं। आंगन की उस दरार के दूसरी तरफ बाहर का संसार तेजी से बदल रहा था। युवा होती लड़कियां ज्यादा आत्मविश्वास से चहकती नजर आती थीं। गली में क्रिकेट खेलते लड़के उन्हें देखकर और दम लगा देते या बॉल कैच करने के लिए कलाबाजियां खाना शुरु कर देते।

तुम्हारे लिए वे सभी दुसरी दुनिया का हिस्सा थे। तुम उस दुनिया का हिस्सा चाहकर भी नहीं बन सकते थे। तुम कभी अगर उनके बीच से होकर गुजरते भी तो लगता जैसे सपनों से निकली कोई भुतैली परछाईं अटपटी चाल से चलती उन लड़केलड़कियों के बीच आकर खड़ी हो गई हो। तुम्हारी जुबान सिल जाती।

अक्सर वह काफी शर्मिंदा होकर लौट जाता और रात को खाली कमरे में चहलकदमी करते हुए अपनी कल्पना में उन लड़कों या लड़कियों से आत्मविश्वास भरा संवाद करने की कोशिश करता। चलते-चलते जब थक जाता तो बिस्तर पर लेटकर आंखें बंद कर लेता। एक बार इसी तरह थककर वह अपने कमरे में सोया ही था कि कुछ गिरने की आवाज आई।

यह मां थीं जो बाथरूम जाते समय आंगन में फिसल गईं। बीते पांच-छह दिनों से उनकी दवा खत्म हो गई थी। बढ़े रक्तचाप के कारण शायद उनका सर चकरा गया और वे गिर गईं। उनकी नाक से गर्म रक्त की एक लकीर बह पड़ी जो उनकी साड़ी पर बड़े-बड़े धब्बे बना रही थी। उसका रंग कुछ वैसा ही स्याह था जैसे उस नन्हीं चिड़िया के बच्चे के तन से निकला था या पिता के होठों के कोर पर जम गया था। मां को काफी चोट आई थी। कंधे और पीठ का हिस्सा स्याह पड़ गया था और बहुत दिनों तक उनका शरीर इस कदर अकड़ा रहा कि उठने-बैठने के लिए भी उन्हें सहारा चाहिए था।

इस घटना का उसकी नींद पर गहरा असर पड़ा। उसे अपनी लापरवाही पर कई दिनों तक अफसोस रहा। उसे बड़ी तीव्रता के साथ यह अहसास हुआ कि किसी तरह मां के न होने पर वह बिल्कुल अकेला हो जाएगा। सिर्फ मां ही उसके अतीत की मौन साझीदार थी। उस घटना के बाद से वह कच्ची नींद सोने लगा था। मां को डायबिटीज़ था और इसके कारण उन्हें बार-बार बाथरूम जाना पड़ता था। रात को मां कांपते-डगमगाते कदमों से बाथरूम की तरफ लपकतीं तो उनके चप्पलों की घिसटती आवाज से उसकी आंखें फट से खुल जातीं और वह लपक कर उन्हें थाम लेता। ऐसा रात में कम से कम दो बार होता था।

धीरे-धीरे मां के चप्पलों की आहट उसकी नींद में दाखिल होती गई।

रात को उसे कई बार उठना होता था। इस आधी-अधूरी नींद में वह धीरे-धीरे उस दहलीज को बेहद करीब से पहचानने लगा था, जहां से लोग सपनों के भीतर कदम रखते हैं। जब वह उनींदा होता था तो आसपास की हलचल धीरे-धीरे उसकी संवेदनाओं को छुए बगैर निकलने लगती थीं। यह ठीक वैसे होता था जैसे पानी के भीतर जाने पर हम सिर्फ अपने चारो तरफ मौजूद पानी के एहसास को जी रहे होते हैं। आसपास की आवाजों से निर्लिप्त उसका मन धीरे-धीरे किसी एक विचार की तरफ केंद्रित होने लगता था। और एक झपाटे के साथ पुरानी स्मृति चील की तरह उसके वर्तमान में दाखिल होती थी। एक अनायास बिंब- जो उसकी प्रत्याशा से बाहर की चीज होती थी।

मेरा अपनी नींद के प्रति सचेत होना दरअसल वास्तविक दुनिया और सपनों के बीच एक पुल बनाता जा रहा था। इसका नतीजा यह होता था कि नींद के हर झोंके के दौरान मेरे दिमाग में बिजली की एक कौंध सी उठती थी। उस कौंध में जो मुझे जो कुछ दिखता वह हकीकत और सपनों के परे था। इतना ही नहीं वह स्मृति, कल्पना या विचार जैसे खांचों में भी नहीं बंटा था। यहां मेरे लिए सब कुछ एक मिश्रित अनुभूति में बदल जाता था। हर कल्पनामय बिंब की जड़ें अतीत की किसी स्मृति में थीं और हर स्मृति की गहराई में कोई विचार घुलामिला होता था। एक दिन एक ऐसी ही कौंध हुई और मुझे लगा कि आने वाले दिनों में हमें दिख रही दुनिया सपाट नहीं रह जाएगी, वह हर तरफ फैली होगी। दसो दिशाओं में।

और उन्हीं दिनों उसने अपनी जिंदगी का सबसे अद्भुत स्वप्न देखा। एक जगमगाता सुंदर शहर- जो सपाट धरती पर नहीं था- पेड़ों की शाखाओं की तरह हजारों किलोमीटर आसमान की तरफ फैला हुआ था। यह एक काली रात थी- जिसमें सुनहरी रोशनी का जाल बिछा हुआ था। वैसी ही रोशनी- जैसी वह बचपन में आंखें बंद करने पर अपने उड़नखटोले में देखता था।

***

यहां तक आते-आते शहर की आवाजें डूब चुकी थीं। सिर्फ उसकी टिमटिमाती बत्तियां नजर आ रही थीं। ऊपर आसमान तारों से भरा था। इतने तारे उसने कभी नहीं देखे थे। ऐसा आसमान सिर्फ बचपन में अपने पिता के साथ नेपाल की तराई के खुले मैदानों में देखा था। इस आसमान में सप्तऋषि भी पहचाने जा सकते थे और एक क्षितिज से दूसरे तक जाती धुंधली आकाशगंगा भी।

वे छत पर थे। अंधेरा था मगर उसका चेहरा तारों की रोशनी में नजर आ रहा था। क्योंकि वह उसके बहुत करीब थी। शायद उसकी इजाजत से वह उसे छू भी सकता था। वह उसके लिए ट्रे में चाय लेकर आई थी। जब कोई लड़की पहली बार हमारी जिंदगी में दाखिल हो रही होती है तो वह दरअसल खुद में एक जिंदगी की तरह होती है- जिसके भीतर हम दाखिल हो रहे होते हैं। मैं उसके भीतर दाखिल हो रहा था। वह धुआँ थी। वह परछाईं थी। वह स्वप्न थी। मैं स्वप्न के भीतर दाखिल हो रहा था। जब मैंने पहली बार उसे देखा था तो घनघोर बारिश हो रही थी। पानी से तरबतर वह भी उसी पुराने मकान के बरामदे में खड़ी हो गई, जहां मैं पानी के रुकने का इंतजार कर रहा था। उसके माथे, पलकों, बरौनियों पर बूंदें अटकी हुई थीं। मैंने बाहर आसमान की तरफ झांका जो स्लेटी बादलों से ढका हुआ था। दिन का उजास लगभग खत्म था। ये बादल मेरी जिंदगी में फिरफिर वापिस आते थे। स्मृतियों से डबडबाए और अनिश्चित भविष्य की कौंध लिए।

हमें चलना है ?”  उसकी आवाज अंधेरे को चीरती हुई टकराई।

हां, हमें चलना है।

मैं करीब आने पर उसकी आंखों में जगमगाते शहर को देख सकता हूं। यह वही शहर है जो मैं देखना चाहता था। उसकी सांसें मुझसे टकरा रही हैं। देखो, मेरे बचपन के सपनों की वह सुनहली रोशनी उसके बालों और चेहरे पर उतर आई है। मैं पलटा। मेरे सामने आसमान तक फैला वह शहर था। आसमान तक जगमगाती मद्धम पीली रोशनियों का जाल। जैसे रात को पर्वतों के बीच गुजरने पर शहर तलहटी से आकाश तक टिमकता दिखता है। वह मुझसे एक कदम आगे थी। उसने पीछे मुड़कर मेरा हाथ थाम लिया। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक थी। हर आगे बढ़ते हुए शहर के भीतर दाखिल हो रहे थे। शहर का बहुत सारा हिस्सा अंधेरे में डूबा हुआ था। हम खाली मकानों के बीच चांदनी रात में फैली भुतैली परछाइयों से होकर भटक रहे थे। खाली पड़े सैकड़ों कतारबद्ध मकान अपनी अंधी खिड़कियों से टकटकी लगाए किसी जैसे किसी अनजान आगंतुक की प्रतीक्षा में थे। मैं उसे लेकर एक छोटे से मकान के भीतर दाखिल हुआ। भीतर रोशनी नहीं थी। फर्श पर चांदनी के चौखटे जहांतहां बिछे थे। वह चुपचाप ठंडे फर्श पर बैठ गई। वह थकी सी लग रही थी।

दोनों कमरे के फर्श पर एक-दूसरे के करीब खामोश बैठे थे। एक वेदना से भरा संगीत उन दोनों के बीच किसी नदी की तरह बह रहा था। यह स्मृतिविहीन अस्तित्व था। यह स्वप्न एक पूरे जीवन जितना विशाल था। इस स्वप्न में उन दोनों के पास न कोई अतीत था और न भविष्य। उसे पहली बार अहसास हुआ कि बीते कल और आगत से छुटकारा पाना कितना सुखद हो सकता है।

इस स्वप्न को वह कभी भूल नहीं पाया। इस सपने में उसने एक पूरा जीवन जी लिया। ऐसा जीवन जिसको पाने के लिए शायद उसने जन्म लिया था मगर उस तक पहुंचने से पहले जागती आंखों के आगे फैले दुःसवप्न में उलझ गया। पहली बार उसे एहसास हुआ कि एक जीवन में कितने जीवन समाये हुए हैं। हर स्वप्न जो याद रह जाता है- किस तरह से स्मृतियों और समय की हदों को लांघ जाता है। काले, अंधेरे महासागर में बहते आइसबर्ग जैसे ये स्वप्न अपने भीतर चांदनी रातों की तरह राज छुपाए हुए थे। उनका वास्तविक जीवन से कोई सीधा संबंध न था। वे काल की सीमाओं से परे किसी अनंत से जा मिलते थे।

दिन छोटे होने लगे और रातें लंबी।

वह रात अक्सर जागते हुए गुजार देता था। नतीजा यह होता था कि दिन में उसे नींद के झोंके आने लगे। कभी भी, कहीं भी। कचहरी की बेंच पर। पार्क में। कई बार साइकिल चलाते वक्त। नींद अचानक बहते पानी की तरह गुजर जाती थी। सपने टुकड़ों में आते थे। ये स्वप्न उसके वर्तमान से आबद्ध होते थे।

जिस दिन वह नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया था, बाहर इंतजार करते-करते उसे नींद आ गई।

तुम्हारे पांव स्कूल के मैदान में अगस्त की बारिश में भीगी घास पर थे। सामने दुबलेपतले गांधीवादी टोपी लगाए प्रधानाचार्य खड़े थे। तुम सहमे हुए थे। अभीअभी तो तुमने गलती की थी। पता नहीं वे इस बारे में क्या सोचेंगे। क्या वे इस आफिस में शिकायत करने पहुंच जाएंगे? जहां तुम आज नौकरी मांगने आए हो? स्कूल के आगे आफिस के लोग भला क्या कर सकते हैं। तुम्हारी गलती तो प्रधानाचार्य को पता चल गई है। हो सकता है प्रेयर के बाद वे तुम्हें अपने कमरे में बुलाएं।

***

उसे जहां काम मिला था, उसका आफिस दवाओं और सर्जिकल सामानों के डिस्ट्रीब्यूटर्स से भरी एक मार्केट में था। वहां दिन भर बिजली न होने के कारण जनरेटर तड़तड़ाते रहते थे। उसे खिड़की के पास सीट मिली थी। तपती गर्मियों में कई बार जेनरेटर खराब होने की वजह से खिड़की खुली रखनी पड़ती थी। मार्केट की दीवारें बरसों से पुताई न होने कारण बदरंग हो गई थीं। खिड़की के ठीक सामने काई लगी दीवार पर बहुत धब्बे पड़े थे। खाली वक्त में वह उस बदरंग दीवाल में तरह-तरह की आकृतियां खोजा करता था। उसमे हरे रंग का एक धब्बा उसे ऐसा दिखता था मानों कोई कुत्ता मुंह फाड़कर भौंक रहा हो। धीरे-धीरे उस भौंकते कुत्ते की शक्ल वाले हरे धब्बे से उसकी पहचान-सी हो गई। कई बार वह बाहर देखता-देखता उनींदा हो जाता तो लगता कि हरे धब्बे में एक लहर सी दौड़ गई।

रात को ठीक से नींद न आना अब तक उसके एक समस्या बन गई थी। वह काफी दुबला और कमजोर भी हो गया था। लिहाजा नींद के झोंके उसे दिन में कई बार आते थे।

एक दिन वह हरा कुत्ता टहलता हुआ उसकी मेज के नीचे आ गया। क्या मुसीबत है…” वह बुदबुदाया। “…नींद कभी भी कहीं भी चढ़ बैठती है। मैं जगा हुआ हूं सो नहीं रहा हूं…” हरा कुत्ता बिना कुछ बोले मेज के नीचे सिकुड़कर बैठ गया। उसने ‘हुश!’ करते उसे भगाने की कोशिश की मगर वह टस से मस नहीं हुआ। वह दुविधा में था कि वह आफिस में सपना देख रहा है क्या? सामने की टेबल से लड़की फाइल लेकर उठी और उसकी तरफ आने लगी। सब कुछ ठीक लग रहा था और वास्तविक भी। यहां तक कि दीवार पर टिकटिकाती घड़ी भी लंच के बाद का समय ही दिखा रही थी। लड़की उसकी टेबल तक पहुंच गई। हरा कुत्ता मेज के नीचे दुबका रहा। आखिरकार खीजकर उसने कुत्ते पर ध्यान देना ही छोड़ दिया।

सपनों से दोस्ती का यह नया पड़ाव था।

दिन की झपकियों में स्वप्न की हर कौंध के साथ वह किसी पुरानी स्मृति में दाखिल होता था मगर उसी पुरानी घटना में उसे बिल्कुल नया अर्थ दिखाई देने लगता था। कभी कई बरस पहले रात को देखे गए कुछ सपने कौंध जाते। मगर वे ऐसे लगते जैसे बचपन की कोई भूली हुई बात अचानक याद आ जाती है। कई बार वह परेशान हो उठता था कि दरअसल उसे जो याद आया है वह उसके किसी ख्वाब का हिस्सा था या वास्तविकता का। यह सब कुछ इतने ही कम समय के लिए होता था जितने कम समय में आकाश में बिजली चमकती है। वह जब तक इन चीजों के मायने को समझ पाता वह तेजी से उसकी स्मृति से ओझल हो जाती। यह बिल्कुल ऐसे ही था जैसे कोई खड़िया से कुछ लिख रहा हो और वह मिटता भी जा रहा हो।

उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिंदगी सिर्फ उतनी भर नहीं है जितनी वह जागते हुए देखता-महसूस करता है, बल्कि नींद और सपनों की देहरी पर खड़े होकर देखो तो वह एक मुकम्मल आकार लेती है।

यह मेरे लिए महज एक संसार से दूसरे संसार में कदम रखने जैसा था। मगर इन दो कदमों के बीच का फासला रहस्य से भरा था। मैं कभी याद नहीं रख पाता था कि मैं किस पल स्वप्न के भीतर दाखिल हुआ। अक्सर होता था कि वास्तविक संसार में सुनाई देने वाले शब्द, ट्रैफिक और जेनरेटर का शोरगुल सब मेरे इर्दगिर्द तैरने लगते थे। आवाजें किसी जंगल, कुहरे अथवा अंधेरी गलियों मे भटकने लगती थीं।

उसने अपनी डायरी में लिखा।

हर बार नींद का झोंका मुझे कुछ भूली हुई बातों की याद भी दिला देता है। यह तत्काल में देखी गई तमाम छवियों में जीवन भर में इकट्ठा छवियों को शामिल कर देता है। उन छवियों से जीवन के प्रति एक नया अर्थ पैदा होता है। हर तात्कालिक छवि किसी पुरानी छवि के साथ घुलमिल जाने पर जीवन के साथ एक नए रिश्ते को खोलती हैजिसे मैं जाग्रत अवस्था में कभी नहीं समझ पाता।

एक दिन और उसने लिखा…

धुंध हमेशा अस्पष्टता नहीं लातीधुंधलापन कई बार जीवन के बड़े अर्थ या रहस्य की तरफ संकेत करता है। स्पष्टता भ्रम पैदा करती है। हर स्पष्ट वस्तु हमें विवश करती है कि हम उसे ठीक उसी तरह से समझें जैसी कि वह अपने भौतिक रूप में हैं। मगर क्या जीवन सिर्फ भौतिक वास्तविकताओं के जरिए समझा जा सकता है? इस दुनिया की हर वस्तु को हम अपने अनुभवों की ताप में महसूस करते हैं। हर भावना संगीत के एक नोटेशन की तरह है, स्वप्न इन्हें संगीत में बदलने की कोशिश करते हैं। यानी हर स्वप्न हमें पूर्णता की ओर उन्मुख करता है। यह भावनाओं की पूर्णता है। जाग्रत अवस्था तो सतही है। वहां हर भावना का एक क्षणिक जीवन है जो बाहरी भौतिक वातावरण से प्रभावित होता है। मगर स्वप्न हर भावनात्मक स्पार्क को सहेजता है और उसको एक वृहत्तर गाथा में बदलता है।” 

सपनों की दुनियां में आवाजाही उसके लिए एक दिलचस्प खेल में बदल गया था।

यह खेल कभी भी शुरु हो जाता था। अपने दफ्तर की चपल और तीक्ष्ण आंखों वाली लड़की को वह अक्सर चोरी-छुपे देखा करता था। चोरी-छुपे ही… क्योंकि उसे हमेशा लगता था कि वह उससे घृणा करती होगी, क्योंकि उसके पास आने पर वह हमेशा किसी न किसी बहाने से उसे नजरअंदाज करती थी।

एक दिन अपनी टेबल पर बैठे-बैठे उसने निगाह दौड़ाई तो पाया कि वह उसी की तरफ देख रही थी। वह उसे देखकर मुस्कुरा उठी। वह समझ गया कि उनींदेपन में उसे सपना आ रहा है। इससे पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ। उसके देखते-देखते वह अपनी मेज से उठी और उसके पास आने लगी। उसने मेज को थपथपाया, ताकि जागने और नींद के फर्क को महसूस कर सके। लड़की सचमुच उसके सामने खड़ी थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करे।

अब उसके सामने एक नया सवाल था। अगर सचमुच वास्तविकता और सपनों के बीच इतना झीना सा फर्क है तो क्या वास्तविकता को भी अपनी निजी रोशनी में देखा जा सकता है। क्या जिंदगी उसकी मनचाही कहानी में बदल सकती है। क्या इस जिंदगी में वह सपनों की तरह एक लंबी दौड़ लगा सकता है। इस दौड़ में सिर्फ जगहें पीछे न छूटें बल्कि परिवेश और काल भी उसके कदमों तले गुजरता जाए। जहां उसे कोई चोट न पहुंचा सके। गर चोट पहुंचाए तो दर्द न हो। वह जिंदगी को एक सख्त खुरदुरे पत्थर की तरह नहीं बल्कि भावना की एक तरंग की तरह महसूस कर सके। जहां जिंदगी के बारे में उसकी नाजुक सोच आहत न हो। बल्कि कल्पनाएं ही जिंदगी बन जाएं। जैसे वाटर कलर से बने सैरा।

वह अपने अतीत को पा सके। खोई हुई सुबह और शामों को पा सके। पिता के कदमों की आहट फिर-फिर सुन सके।

***

उसने अपनी बेमकसद जिंदगी का मतलब सपनों में तलाशना शुरू कर दिया। उसकी चेतना में दो दुनियाओं के बीच का फर्क मिट गया। स्वप्न कभी भी उसके वर्तमान में दाखिल हो जाते थे और वह अपने सपनों में कभी भी एक सचेत हस्तक्षेप कर सकता था।

वह धुआँधार बारिश का मौसम था। दीवार की दरार नन्हें प्राणियों से भर गई थी। साल-दर-साल वह और कमजोर होता जा रहा था। जब कभी आइने के सामने वह अपने कपड़े उतारता तो हड्डियों का ढांचा भर नजर आता। मां इस बीच ज्यादा बीमार और अपने में खोई रहने लगीं। मां उसके अस्तित्व से इस कदर अभिन्न हो गई थीं कि कई बार उनकी अनुपस्थिति का ख्याल ही उसके सामने एक भयावह शून्य खड़ा कर देता था।

…और एक दिन कुर्सी पर बैठे-बैठे नींद के झोंके मे उसे अपने पिता दिखाई दिए, जिन्हें वह लगभग भूल चुका था। ठीक वैसे और उतनी ही गरमाहट से भरे हुए जैसे कि बचपन में दिखते थे। वे किसी से जिरह कर रहे थे। एक विश्वास से भरी जिरह। उनके पास हमेशा की तरह नपे-तुले शब्द थे- जिनमें जीवन की समझ छिपी थी।

इस सपने में मुझे पिता का नया रूप दिखाई दिया। जिसे मैं बचपन में कभी समझ नहीं पाया था। शायद तब मैं बहुत छोटा था। अब मुझे एहसास हुआ कि वे दरअसल जिंदगी को इस तरह से समझते थे कि उनका होना और उनकी जिंदगी दोनों एक हो जाएं। जीने का अर्थ उनके शब्दों और कर्म में छिपा था। मेरे सपने में वे जिस नरमाहट भरी दृढ़ता के साथ अपनी कह रहे थेउसके पीछे उनकी अपनी आत्मा की आवाज थी।

उसकी नींद उस बात की तह तक न जा सकी। पिता की जिद क्या थी? वह कभी समझ नहीं पाएगा।

मगर यह सपना उसे एक बिल्कुल नई वास्तविकता के करीब ले गया। उसे इस बात का एहसास हुआ कि कैसे कोई ‘न होने के बावजूद’ अपने अस्तित्व के एहसास को बनाए रख सकता है। वह उसी तरह से हमारे आसपास मौजूद रहेगा जैसे अषाढ़ के काले घुमड़ते बादलों में पानी मौजूद होता है। वैसे ही पिता थे। उसके स्वप्नों में विचरते। उसके आसपास। शरीर से नहीं। शब्दों से नहीं। आवाज से नहीं। अपनी गति से। अपने कर्म से। उनके कर्म ब्रह्मांड में दर्ज थे। घटनाओं के गणितीय संयोग में अतीत की फुसफुसाहट फिर सुनाई देती है। काल के अंतराल मिट जाते हैं। तारीखों से पर्दे उठ जाते हैं और पुरानी घटनाएं वर्तमान के मंच पर चहलकदमी करने लगती हैं। समय के बंधन से परे। वह कभी भी उनसे मिल सकता है।

और एक दिन वह अपनी कुर्सी से उठा और अगले ही कदम में पांच जनवरी 1978 की कुहरे से भरी सर्दियों में दाखिल हो गया। बाहर धुंध इकट्ठा होने लगी थी। सड़क पर कहीं रेडियो से फिल्मी धुन उठ रही थी। चालीस वाट के बल्ब की पीली मटमैली रोशनी में मां किचन में स्टोव को पंप करती नजर आतीं। तख्ते पर पड़े अखबार के पन्नों पर सिनेमा के बड़े-बड़े इश्तहार छपे थे। दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने आंगन पार करके सांकल खोली तो पिता नजर आए। आप कहां थे? आप तो अपने आफिस में हैं और ही अब मेरे घर पर नजर आते हैं। आखिर कहां छिपेछिपे घूमते रहते हैं आप? मैं बड़ा हो चुका हूं। कितनी सारी बातें आपसे बताने के लिए हैं…”

वह आवेश में आकर उनसे जिरह करता है। आखिर बचपन से ही सोचता आया है कि बड़े होने पर पिता मिलेंगे तो ऐसे ही बात करूंगा।

पिता उसे ग़ौर से सुनते हैं मगर उससे बात नहीं करते हैं। पिता कभी भी उससे सपनों में बात नहीं करते। तब उसे बड़ी शिद्दत से यह अहसास हुआ कि सपने में दाखिल होने के बाद भी वह एक आउटसाइडर है। सपनों की दुनिया से उसका कभी सीधा रिश्ता नहीं बन सकेगा। वह सपने में दाखिल तो हो सकता है मगर कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। बस एक दर्शक की तरह देख सकता है। वह चीखेगा मगर उसकी चीख उन्हें कुहरे की तरह चीरते हुए कहीं गुम हो जाएगी। “मैं और पिता अंतरिक्ष में छिटके सितारों की तरह थे। एकदूसरे को देख सकते थे मगर काल की गणना ने हमें हजारों प्रकाशवर्ष दूर फेंक दिया था।

***

मां के कमरे में लटके कैलेंडर की तारीख कई दिनों से नहीं बदली है। खिड़कियों से आ रही तेज हवा से उसके पन्ने फड़फड़ा रहे थे। वह बीते कई दिनों से दफ्तर नहीं गया। मां एक हफ्ते से बुखार में है और वह अपने बंद कमरे के चम्पई अंधेरे में लगातार अपने अतीत से लड़ रहा है। कमरे की छत पर रोशनी से बनती-बिगड़ती छवियों को वह गौर से देखता रहता है।

सुबह होने वाली मगर बीते कई घंटों से छत पर रुक-रुककर कोई आहट हो रही है। शायद रात से मुंडेर पर बाघ टहल रहा है। वह खिड़की से झांकता है तो पाता है कि बाहर आंगन में पिता खड़े हैं। कुछ पलों बाद वे चुपचाप आंगन में बैठ जाते हैं और दीवार के पास रखी खुरपी उठाकर आंगन में बनी क्यारी की गुड़ाई शुरू कर देते हैं। वह खामोशी से अपने पिता को देखता रहता है। थोड़ी देर बाद भीतर मां के कमरे में जाता है। उनके बदन से आंच उठ रही है। उनकी आंखें बंद हैं और सांस तेजी से चल रही है। जब वे सांस छोड़ती हैं तो उनके गले से थीमी सी गुर्राहट सी निकलती है।

वह मां के सिरहाने बैठ गया। उसने मां का हाथ थामा। उनका हाथ बहुत हल्का लग रहा था। किसी सूखी हुई टहनी की तरह। सफेदी लिए गोरी रंगत पर ढेर सारी नसें उभरी हुई थीं। बाहर सुबह की बयार में कोई परिंदा चहचहा रहा था। मां ने खाली कमरे में बुखार में आंखें बंद किए-किए कुछ बुदबुदाया…। उनकी बंद आंखों के भीतर समय बीस साल पहले की तरफ घूम चुका था। जुलाई की वह सुबह रोज के मुकाबले कुछ ज्यादा अंधेरी थी। आसमान में फैले बादल उसकी मां के स्तनों की तरह भारी और डबडबाए हुए थे। मां ने अस्पताल के सुरमई उजाले में उसे पहली बार देखा था। उसकी काली आंखों और हाथ-पैर की पारदर्शी उंगलियों को। सीधे उनके गर्भ से बाहर आया एक धड़कता हुआ अलहदा अस्तित्व।

बाहर का दरवाजा खुला था। हवा के झोंके से कमरे के पर्दे हल्के-हल्के हिल रहे थे। भीतर घर में कहीं पानी टपकने की आवाज़ आ रही थी। उसने अपनी आंखें बंद कीं और पानी गिरने की आवाज को चुपचाप सुनता रहा। बंद पलकों के पीछे अंधेरे में दिन भर की जाने कितनी बातें बवंडर की तरह चक्कर खाती रहीं… और तब उसने मां को देखा। जैसे वे उसके बचपन में दिखती थीं। जवान, खूबसूरत और इत्मिनान से भरी। किसी शांत दोपहर में कच्ची दीवालों वाले घर की खिड़की से बाहर ताकती। उनके हाथों में एक डायरी थी, जिस पर वे किताबों में पसंद आ जाने वाली कविताएँ या शायरी बड़े धैर्य से बैठकर लिखती रहती थीं। वह उनके करीब गया। बाहर की बयार से पेड़ सरसरा रहे थे और मां के चेहरे पर ढलक आई लटें हल्के-हल्के हिल रही थीं। वे अपनी डायरी पर झुकी हुई थीं। उनके चेहरे पर एक उजाला ठहरा हुआ था। वह एक एकाग्र और अपने में तल्लीन चेहरा था। मां की यह छवि उनकी बाद की तमाम छवियों के भीतर कहीं खो गई।

मन के भीतर एक के बाद एक दरवाजे खुलते चले जाते हैं। यही मां की वो छवि थी जिसको उसने असल जिंदगी में खो दिया था। मां खुद इस छवि को खो चुकी थीं। इसके बाद सपनों की एक अनवरत दौड़ थी उस खोई छवि को पाने की।

उसकी आंखें खुल जाती हैं। मां बार-बार अपनी जुबान होठों पर फेर रही हैं। उनको पानी चाहिए। वह उनके पास से उठकर मेज के पास तक जाता है। तुम हर दूसरे पल बदल जाते हो। समय तुम्हारे भीतर से होकर बह रहा है। मगर उस धारा में कुछ ऐसा है जो बदलता नहीं और स्वप्न की मृगमरीचिका बन जाता है। तुम उसे हासिल करने के लिए अपने अवचेतन में दौड़ते रहते होमगर वह कभी हाथ नहीं लगता…”

वह मां के करीब आता है। उनकी पीठ पर अपनी बांह का सहारा देकर पानी का गिलास उनके होठों से लगा देता है। मां अपना गला थोड़ा सा तर करती हैं, फिर तकिए पर टेक लगा लेती हैं। वह उसकी तरफ इस तरह से देखती हैं जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों। ऐसा अक्सर उस वक्त होता है जब शरीर की तकलीफ उनकी बर्दाश्त करने की हद को पार करने लगती। “चिंता मत करिए आप ठीक हो जाएंगी…” उसने आहिस्ता से कहा।

“…फिर हम उस शहर चलेंगे जो दसो दिशाओं में फैला है। पेड़ की शाखाओं की तरह आसमान तक फैली उसकी सड़कें और मकान जगमगा रहे हैं। उसी शहर के किसी अनजान कोने में वह लड़की भी होगीजो घनघोर बारिश के बीच किसी मकान के बरामदे में भीगतीठिठुरती मिली थी। शायद वहां आपको पिता भी मिल जाएंहो सकता है वे हमसे कभी न मिलें और शहर की अंधेरी गलियों में हमसे छिपते फिरें। वहां मैं आपसे एक बार फिर मिलुंगा। उस मां से जिसे मैं नहीं जानता। जो लकड़ी की संदूकची में बंद अपनी पुरानी चिट्ठियों जैसी रहस्य से भरी है।

वहां मैं खुद से भी मिलुंगा। किसी छत पर खड़ा दूर छितिज में उड़ती धूल को कौतुक से देखता…”

 

समाप्त

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विज्ञापन वाली लड़की

बीते एक हफ्ते से लगातार पानी बरस रहा था। आसमान में सुरमई बादल भाप की तरह उड़ते थे और आभासी उजाले में भागती गाडिय़ों की हेडलाइट में आसमान से गिरती बूंदें चमकने लगती थीं। इस मौसम में उसे करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर शाम को दफ्तर पहुंचना होता था। गोल घेरा बनाकर बैठे मजदूरों, चाय की प्याली से उठती भाप, टीन के ढाल पर बहते पानी के रेले और सजी मंडी की कीच भरी गलियों को पार करता वह कुछ ही देर में हाइवे पर निकल जाता था। इस हाइवे पर आकर वह करीब एक किलोमीटर की बचत कर लेता था। यहां आसपास नयी जिंदगी बस रही थी। हजारों मजदूर ईंट ढोते और गारा तैयार करते नजर आते। शहर बदल रहा था। इस शहर की हलचल दरअसल उस वीराट धक-धक का एक हिस्सा थी, जो वहां सिर्फ दो सौ किलोमीटर पर हो रही थी। यह दुनिया के एक बहुत बड़े महानगर के सीमांत पर बसा कसबेनुमा शहर था, जिसकी तलछटों में कालिख, धुएं और शोर में डूबे इलाके थे।

यह शहर उसके अपने घर उसकी बीमार मां से एक हजार किलोमीटर दूर था। जिस अखबार के दफ्तर में वह काम करता था, वह शहर के बाहरी हिस्से में बसे इंडस्ट्रीयल एरिया में बना था। कागज के भारी-भरकम रोल के बीच से गुजरता हुआ वह गोदाम जैसे बड़े हाल की सीढिय़ां चढ़ता था, जिसके कोने पान की पीक से कत्थई रहते थे। ऊपर लाइन से कंप्यूटर लगे थे, इनके की-बोर्ड और स्क्रीन मटमैले हो चुके थे और पीछे लगे तार महीनों पुरानी धूल से अटे रहते थे। वह सीट पर जाते ही खाकी लिफाफों को फाड़ता, तह लगाये कागजों को स्टैंड पर लगाता और काली-नीली रोशनाई पर आंखें टिका देता। ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में दर्जन भर की-बोर्ड खडख़ड़ाते रहते। आधी रात बीत जाने के बाद काम खत्म होता था। अक्सर पैदल ही दूसरे रास्ते से घर की तरफ चल देता था।

एक शाम जब आसमान में बादल बहुत निचाई पर धुएं की तरह तैर रहे थे और हवाओं का मिजाज तूफानी था, उसने पेड़ के नीचे ठिठुरते हुए वह विशालकाय होर्डिंग देखा। वह अवाक रह गया। उधर से दौड़ती गाडिय़ों की हेडलाइट होर्डिंग पर रोशनी के सैकड़ों प्रतिबिंब बना रहे थे। वह एक मोबाइल कंपनी का बेहद लंबा होर्डिंग था। उसका अधिकांश हिस्सा खाली था। बायीं तरफ एक लड़की खास भंगिमा में खड़ी मुस्कुराती हुई खड़ी थी। वह हैरान रह गया। वह दरअसल मुस्कुराती हुई उसी की तरफ देख रही थी।

उस दिन उसे हल्का सा बुखार भी था। संदेह को झुठलाने के लिए उसने सावधानी से सड़क पार की। लड़की अभी भी अपलक देख रही थी। अब देखने में ज्यादा बेबाकी थी। उसकी पूरी मौजूदगी में एक तपिश थी। एक मद्धिम आंच – जो उसकी आंखों के पीछे आहिस्ता-आहिस्ता सुलग रही थी। बलखाए बालों के बीच गाल दहक रहे थे। मुस्कुराहट में भी एक ताप था। ऐसी सुंदरता थी जो आग में होती है – निषिद्ध, खतरनाक और गरमाहट से भरी सुंदरता – जंगल में जलने वाली आग की तरह रहस्यमय। तो क्या बचपन से वह जो ख्वाब देख रहा था सही साबित हुआ। आखिर इस तकलीफ से भरी जिंदगी से परे कोई तो दुनिया है। जहां लोग सचमुच उसी तरह से खुश हैं, जिस तरह से उन्हें होना चाहिए।

इन ख्वाहिशों ने लंबी तपती दुपहरियों में ऊंधते कसबे के उन उकताहट से भरे दिनों जन्म लिया था, तब वह तेरह साल का था। पिता को गुजरे भी दो ही साल बीते थे। वे एक सरकारी महकमे में बाबू थे। मां उसे लेकर सालों से बंद उस पुश्तैनी मकान में लौट आयीं, जिसकी छत पर लकड़ी की दीमक खाई कड़ियां लगी थीं। वहां की नक्काशीदार पल्लों वाली एक अलमारी पुरानी पत्रिकाओं से भरी पड़ी थी। सन 1958 से लेकर 1974 तक की पत्रिकाएं – जिनके कागज पीले पड़ चुके थे और हर पत्रिका में कागज से एक अलग किस्म की खुशबू उठती थी। यह पिता से उम्र में बहुत बड़े उसके ताऊजी का संग्रह था। वह अक्सर उन पत्रिकाओं की धूल झाड़ता और उन्हें लेकर बैठ जाता था।

उसे विज्ञापन सबसे ज्यादा दिलचस्प लगते थे। जिनमें मुस्कुराते हुए स्वस्थ नन्हें बच्चे थे। थोड़े बड़े बच्चों में हमेशा एक भाई और एक बहन दिखाई देते। बहन फूलों की छाप वाला फ्राक पहने रहती और उसकी हमेशा दो चुटिया बनती थी। इन बच्चों के साथ हमेशा उनके माता-पिता होते थे। बुजुर्ग दादा या नाना हमेशा कुर्सी पर अखबार पढ़ते दिखते और खुशमिजाज बूढ़ी औरतें सिलाई करती या स्वेटर बीनती नजर आती थीं। इन पुरानी पत्रिकाओं में भी फिल्मी अभिनेत्रियां एक खास साबुन को अपनी सुंदरता का राज बताती थीं। उनकी क्लैक एंड व्हाइट तस्वीर छपी होती थी। सन बासठ के बाद की बच्चों पत्रिकाओं में चीन को ललकारने वाली बाल कविताओं के अलावा अक्सर टाफियों के विज्ञापन होते थे। टाफियों के चौकौर और गोल टीन के डिक्बों पर ब्रिटिश स्टाइल के हेयर कट और फ्राक वाली युवतियां होती थीं। वह पूरा-पूरा दिन इन विज्ञापनों में डूबा रहता था।

बचपन से ही उसे अक्सर बुखार आता था। बुखार से समय वे तसवीरें रात को सोते वक्त तक उसके हवास पर छायी रहती थीं। वह खुद को बड़ा होने पर अक्सर प्रिंटेड शर्ट और बेलबॉटम पहने मोटरसाइकिल चलाते एक युवक के रूप में देखता था, जिसे उसने शूटिंग-शर्टिंग के एक विज्ञापन में देखा था। वह मां को हमेशा घर में बने मंदिर के पास आरती की थाल लिये देखता था। वह मुस्कुराते हुए उसे आशीर्वाद देती थी – वह शायद घी के किसी विज्ञापन से निकली थी।
पड़ोस से मांगी कुछ नयी-ताजी पत्रिकाओं में कभी-कभार चिकने रंगीन पन्नों पर तौलिया लपेटे वह युवती दिखाई दे जाती – जिसकी जांघों का बड़ा हिस्सा खुला होता था या फिर गीजर के विज्ञापन में दरवाजे के पीछे से झांकती मॉडल, जिसके कंधों से लेकर कमर के नीचे तक का आधा हिस्सा बिल्कुल नग्न दिखाई देता। इन तसवीरों को वह देर तक देखता था – एक अव्यक्त सी सनसनी के साथ।

बदलते विज्ञापनों के साथ उसके सपने भी बदलते गये। अब इन विज्ञापनों में हीरो साइकिल पर सवार उमंगों से भरे युवक-युवतियों के बीच प्रेम की तितलियां नहीं फडफ़ड़ाती थीं। उनकी जगह कसरती शरीर वाले जीन्स पहने उन नौजवानों ने ले ली थी, जो रोमांचकारी यात्राओं के शौकीन थे। उनके पास बाइक और स्पोर्ट-शू थे। उनके कमरे में गिटार लटकता रहता और टेबल पर बाइनाक्यूलर, कंपास और रोड मैप फैला दिखाई देता। विज्ञापन में युवतियां अब शालीन स्वभाव और करीने से पहने कपड़ों को पसंद करने की बजाय गठीले बदन और मर्दाने अंदाज पर फिदा होती थीं। उम्र बढने के साथ-साथ उसकी काठी, चेहरा-मोहरा और समूची शख्सियत विज्ञापनों के संसार से निराशाजनक हद तक भिन्न थी।

लंबी बेरोजगारी, ट्राइका की गोलियों और मां की उदासी के बाद नौकरी करने वह अपना घर छोड़कर यहां चला आया। यह नौकरी उसके मामा ने लगवायी थी। दूधिया रोशनी में नहाये विशाल होर्डिंग तेजी से उस शहर में फैल रहे थे। टेलीविजन पर कोल्ड ड्रिंक पीते बिंदास नौजवान हों या घड़ी के विज्ञापन में टेनिस खेलते, टाई की गांठ बांधते हाथ या फिर साबुन, खुशबूदार मसाले या कंडोम के बहाने चुहल करते नवदंपति, वह सभी को पूरी दिलचस्पी से देखता था। उसे उसी दूसरी दुनिया की तलाश थी। उस संसार में एक अनुशासन था, कोई बुरा नहीं था, सभी एक-दूसरे की इज्जत करते थे, सभी खुश थे, सभी वर्तमान में जीते थे।

उस रात डेढ़ बजे ग्रिड फेल हो गयी और पूरा शहर अंधकार में डूब गया। आसमान में बिजली लगातार कंपकंपा रही थी मगर कोई गर्जना नहीं थी। हवा बिल्कुल चुप थी। वह गलियों से होता हाइवे की तरफ निकल आया। आज होर्डिंग अंधेरे में डूबा हुआ था। करीब डेढ़ मिनट पैदल चलने के बाद बाद अचानक आधा आसमान भक से सफेद हो उठा। बिजली की इस कौंध में उसने जो देखा, तो उसे खुद पर यकीन नहीं हुआ…

विज्ञापन वाली लड़की होर्डिंग में नहीं थी।

वह कहां चली गयी? वह बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचता रहा। नहीं! तस्वीरें बेजान नहीं होतीं। वह लड़की भी आजाद हो गयी है। वह तीर की तरह उस अंधेरी रात में निकल पड़ा। गलियों में भौंकते आवारा कुत्तों और डीजल सने कीचड़ में धंसे ट्रकों के बीच मंडराते हिजड़ों से बचता वह मंडी की तरफ भागा जा रहा था। वह पूरे जीवन जो सोचता रहा वह गलत नहीं था। उस ‘दूसरी दुनिया’ का अस्तित्व है। वह लड़की सचमुच है। बूंदें बे-आवाज उस अंधेरे में डूबे शहर पर गिरने लगीं। एक गली से दूसरी गली छानते हुए आखिर वह मिल गयी। बारिश में तरबतर। दुकानों के शटर के बीच खाली हिस्से में दुबकी हुई। बारिश में भीगकर उसका ताप खत्म हो चुका था। वह रात के अंधेरे में राख की तरह उदास और सुरमई लग रही थी।

अब वह तौलिये से अपने बाल सुखा रही थी। सवा महीने से होर्डिंग में अटकी लड़की आज उसके घर थी। उसने लड़की को गरम चाय पिलायी और नारियल वाले बिस्कुट खाने को दिए, जिसे उसने चुपचाप बच्चों की तरह खा लिया। सुबह होने वाली थी। वह सूखे कपड़ों और चादर की गरमाई में दुबककर सो गयी। सुबह 10-11 बजे आंख खुली तो देखा कि विज्ञापन वाली लड़की ने किसी भी आम हिंदुस्तानी स्त्री की तरह उसके कमरे में बिखरे सामान को काफी करीने से लगा दिया था। खुद चुपचाप कोने में बैठी अपने नाखूनों को कुरेद रही थी। वह उस लड़की से बात नहीं करना चाहता था। उसे भय था कि कहीं बात करते ही यह पारभासी हकीकत छिन्न-भिन्न न हो जाए। इसलिए वह जल्दी से जल्दी दिन की रोशनी में उस होर्डिंग को दोबारा देखना चाहता था। दोपहर डेढ़ बजे ही वह हाइवे पहुंच गया। होर्डिंग रात की तरह खाली था।

किशोरावस्था के दिनों में ‘कंप्लीट मैन’ की परिभाषा बताने वाली एक शूटिंग-शर्टिंग कंपनी का विज्ञापन उसे बेहद पसंद था। उनमें हंसमुख, उदार, बच्चों और जानवरों के साथ खेलने वाले, एकांतप्रिय और प्रतिभावान पुरुष होते थे। वे स्त्रियों से प्रेम करते थे मगर अपनी बनायी दुनिया से कभी बाहर नहीं निकलते थे। बाद के सालों में जवानी में कदम रखने के साथ टेलीविजन पर वाशिंग मशीन, रेफ्रीजिरेटर, कम कीमत वाली कारें और माइक्रोवेव ओवेन अपने साथ रिश्ते, प्रेम, सहनशीलता और सुखी जीवन की नयी परिभाषाएं लेकर आए।

उस दिन जब वह घर पहुंचा तो शाम हो गयी थी। मौसम खुला था। छत पर गया तो देखा कि जिस तरफ अभी-अभी सूरज डूबा था, उस तरफ दर्जनों पतंगें हवा में हलके-हलके कांप रही थीं। वह दरवाजा खोलकर अंदर गया तो देखा लड़की फर्श पर घुटने मोड़े सो रही थी। इस वक्त वह ग्लैमरस मॉडल नहीं बल्कि किसी आम सुंदर लड़की जैसी दिख रही थी। अगस्त की उमस के चलते उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आयी थीं। कमरे से लगे छोटे से चौकोर किचेन में खाली बरतनों से अंदाजा लग गया कि दुपहर में उसने अपने खाने के लिए कुछ पकाया भी था। वह खुद भी फर्श पर बैठ गया और उसे सोते हुए देखता रहा।

उसे चाकलेट कंपनी का वह विज्ञापन याद आ गया जिसने सबसे पहले उसके जेहन में साहचर्य का भाव विकसित किया था। उसे एहसास हुआ कैसे दो इंसान उम्र और रिश्तों में अलग-अलग होते हुए भी एक दूसरे के मन की बात को समझ सकते हैं। अब तो उन दोनों के बीच बातचीत भी शुरू हो गयी थी। शुरुआत उस लड़की ने ही की थी। जब पहली बार लड़की की आवाज कानों से टकराई तो एक पल के लिए उसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ। बहुत साफ आवाज और बहुत स्पष्ट से शब्द।

‘तुम मुझे पहचानती थी?’
‘हां, सचमुच, तुम सबसे पहले थे – जिसने मेरी तरफ अलग तरीके से देखा, जैसे मुझे सचमुच जानते हो…’
‘मैंने देखा कि तुम मुझे देख रही थी…’
‘हां, मैं तुमको ही देख रही थी, तुम कितनी रात गये उधर से अकेले जाते थे।’
‘मैंने आज तक यह बात किसी को नहीं बतायी है कि तुम मुझे देखती रही और अब मेरे पास हो।’
‘किसी को भी बताना भी मत…’
‘… पर तुम कौन हो?’
‘जैसे तुम हो, वैसे ही मैं भी हूं!’

लड़की ने उसे तमाम दिलचस्प बातें बतायीं। जैसे कि वह एक महत्वाकांक्षी एड डिजाइनर की कल्पना है। उसने अपने कंप्यूटर में सैकड़ों युवतियों की तस्वीर को फीड करने के बाद उसका निर्माण किया। उसे सुंदरता, मुस्कुराहट और शोखी दी। लड़की ने हंसते हुए कहा – तुम दरअसल तुम नहीं हो, तुम तो हजारों विज्ञापनों की एक संरचना हो – बिल्कुल मेरी तरह। बस फर्क इतना है कि तुम दर्पण के उस तरफ हो और मैं इस तरफ।

दोनों साथ बैठकर खाना खाते और फिर बातें करते हुए वहीं फर्श पर लेटे-लेटे सो जाते। अर्सा पहले एक कंपनी ने यह समझाया था कि घड़ियां सिर्फ समय देखने के लिए नहीं होतीं, वे अगर तोहफा बनें तो प्यार के इज़हार का तरीका भी होती हैं और शरीर का आभूषण भी। उस विज्ञापन ने समझाया समय सिर्फ वह नहीं जो घड़ी में नजर आता है, समय वह है जो जीवन में घटित होता है, घड़ी तो उसका महज गवाह होती है।

वे बातों-बातों में एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। इतना कि लड़की के शरीर से उठती खुशबू उसके नथुनों से टकराने लगती। वह लेटे-लेटे सोई हुई लड़की की सांसों के साथ उठते-गिरते सीने को देखता रहता। उस शाम लड़की का टाप पेट से बित्ते भर ऊपर खिसका हुआ था और जींस के बटन से थोड़ा ऊपर उसकी नाभि दिखाई दे रही थी। उसकी त्वचा की रंगत में एक किस्म की गहराई थी – जैसे बहुत दूध डालकर बनायी गयी चाय की रंगत। उस शरीर से गुजरते हुए एक दूसरी दुनिया के दरवाजे खुलते थे, जहां हंसते ईमानदार लोग थे। छोटी-छोटी बातों में खुशी तलाशने वाले लोग थे। उसने लड़की के पेट के निचले हिस्से पर कसी हुई जींस का बटन खोल दिया। उसी वक्त लड़की की आंखें खुल गयीं थीं। शहर पर झुके बादलों में लगातार गडग़ड़ाहट हो रही थी। तभी शायद लड़की ने जो कुछ कहा वह उसे सुनाई नहीं दिया। बादलों की गडग़ड़ाहट बहुत देर तक आसमान में भटकती रही। वह स्तब्ध सा उसके ऊपर झुका रह गया। लड़की की आंखों में रोष भरी नमी थी।

वह जाने कब सो गया। आंख खुली तो चेहरा आंसुओं से तरबतर था। वह बुखार में तप रहा था। रात के नौ बज रहे थे। कमरे में चारों तरफ लड़की कहीं नहीं दिखाई दी। उसने जल्दी-जल्दी किचेन और बाथरूम भी छान मारा। बाहर झांका तो पानी लगातार बरस रहा था – पूरे शोर के साथ।

उस रात जैसे आसमान फट पड़ा। इस पूरे मौसम में ऐसी बारिश कभी नहीं हुई। सड़क से लगे चबूतरों की सीढिय़ां पानी में पूरी डूब गयीं। कुत्ते पानी में तैरते हुए इधर से उधर भाग रहे थे। गलियों में घुटनों तक हरहराता पानी बह रहा था। उसने देखा पानी में अखबारों के टुकड़े बहे चले जा रहे थे। सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन, चाय के खाली डब्बे पर मुस्कुराती गृहणी और दीवारों से उखड़े सिनेमा के पोस्टर उस तेज धार में नाचते हुए आंखों से ओझल हो गये। वह लड़की को खोजने के लिए भटकता रहा। मंडी में बने विशालकाय गोदाम – जहां छत पर बने पाइपों से शोर करता हुआ पानी नीचे गिर रहा था, टखनों तक पानी से भरी गलियां, सड़क के किनारे खड़ी ट्रकों की अंतहीन कतार – वह कहीं नहीं मिली। उसे अपने पेट के निचले हिस्से में फिर ऐंठन सी महसूस हुई, मगर इस बार ज्यादा तकलीफदेह। उसे कंपकंपी सी लगी और नथुनों से आती-जाती सांस गरम महसूस हो रही थी। उसे फिर बुखार आ गया था। वह भागता हुआ हाइवे की तरफ जा रहा था। सड़क के बगल से नाला गुजरता था। उसमें से ऐसा शोर उठ रहा था जैसे किसी पहाड़ी नदी से उठता है।

वह लोहे के उन भारी-भरकम एंगल के पास कांपता हुआ खड़ा हो गया, जिन पर वह विशाल होर्डिंग टिका था। उसने खुद को शांत करने का प्रयास किया मगर उसके भीतर कंपकंपी बढ़ती चली गयी। उसके पेट में फिर तकलीफदेह ऐंठन शुरू हो गयी। वह पानी से इस कदर तरबतर हो गया था कि उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी। माथे से बहता पानी नाक-मुंह के भीतर घुसता चला जा रहा था। वह घुटनों के बल वहीं कीचड़ में बैठ गया।

अगली सुबह भी आसमान में बादल छाये थे और हल्की फुहार गिर रही थी। हाइवे पर एक लावारिस शव मिला। पानी से सराबोर शरीर बिल्कुल ठंडा और अकड़ा हुआ था। जेब में मिले कागजों से पता लगा कि वह उसी शहर से छपने वाले अखबार के दफ्तर में एक कंपोजीटर था। उसके कमरे की छानबीन से भी कुछ खास पता नहीं चला। किचेन देखने से लग रहा था करीब दो हफ्ते से उसमें खाना नहीं पका है। अलबत्ता उसके रूम में अखबारों और पत्रिकाओं से काटी गयी विज्ञापनों की ढेरों कटिंग बरामद हुई। उनमें से बहुत सी कमरे में बिखरी हुई थीं और कई पालीथीन में सहेज कर रखी हुई थीं। घर में बन और डबलरोटियों के खाली रैपर छिटके हुए थे। एक लेटर पैड पर चार-पांच लाइनें लिखी हुई थीं। शायद वह अपनी मां को चिट्ठी लिख रहा था…

अगली रात फिर बहुत पानी बरसा और विज्ञापन वाली लड़की मुस्कुराती रही!

Sita Sings the Blues

Sita Sings the Blues

I have really something great to share. This time about a film titled ‘Sita Sings the Blues’. This movie is remarkable not for only it’s feature-length animated treatment of the Ramayana, that has well worth every minute of your time, or  just for wonderful elements of mythology with the winsome voice of Jazz singer Annette Henshaw.

This  film is remarkable because it shows how one person with a laptop and something to say can make a masterpiece. This is  more remarkable because of it’s attitude to a film as a part of open source.

This film was  directed by Nina Paley, an American cartoonist, animator and free culture activist. She was the artist and often the writer of comic strips Nina’s Adventures and Fluff, but most of her recent work has been in animation. She released this film on the Internet under the Creative Commons License.

This movie uses an unique distribution system. It was released for free download starting in early March, 2009 “at all resolutions, including broadcast-quality, HD, and film-quality image sequences”, licensed under the Creative Commons Attribution-Share-alike 3.0 Unported license. The freely downloaded files will count as “promotional copies” and will thus be exempt from payments to the copyright holders of the songs.

She puts a welcome note on movie’s official site:

I hereby give Sita Sings the Blues to you. Like all culture, it belongs to you already, but I am making it explicit with a Creative Commons Attribution-Share Alike License. Please distribute, copy, share, archive, and show ‘Sita Sings the Blues’. From the shared culture it came, and back into the shared culture it goes. You don’t need my permission to copy, share, publish, archive, show, sell, broadcast, or remix Sita Sings the Blues. Conventional wisdom urges me to demand payment for every use of the film, but then how would people without money get to see it? How widely would the film be disseminated if it were limited by permission and fees? Control offers a false sense of security. The only real security I have is trusting you, trusting culture, and trusting freedom.

‘Sita Sings the Blues’ has won a number of awards.  Though it creates a lot controversy around it. In April 2009, a group called the Hindu Janajagruti Samiti started a petition demanding “a complete ban on the movie and initiation of legal action against all those who have been involved in production and marketing of this derogatory act against the entire Hindu community.

Eminent critic and writer Amitava Kumar worte abot this film:

The film returns us to the message that is made clear by every village-performance of the Ramlila: the epics are for everyone. Also, there is no authoritative narration of an epic. This film is aided by three shadow puppets who, drawing upon memory and unabashedly incomplete knowledge, boldly go where only pundits and philosophers have gone before. The result is a rendition of the epic that is gloriously a part of the everyday.